
आस्था, वोटर और पावर... पंजाब चुनाव 2027 का फैसला कैसे तय कर सकते हैं डेरे
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बजट वाले दिन डेरा सचखंड बल्लन जाना और गुरु रविदास जयंती में शामिल होना पंजाब की राजनीति में दलित वोट बैंक और डेरों की भूमिका को फिर केंद्र में ले आया है. करीब 32 प्रतिशत दलित आबादी वाले राज्य में बीजेपी अपनी कमजोर पकड़ मजबूत करने के लिए डेरों के जरिए सामाजिक समीकरण साधने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अन्य दल भी समय-समय पर डेरों का रुख करते रहे हैं.
बजट वाले दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का डेरा सचखंड बल्लन पहुंचना अब पंजाब की सियासत का बड़ा मुद्दा बन गया है. वह गुरु रविदास जयंती के 649वें कार्यक्रम में शामिल हुए. इसके बाद पूरे पंजाब में डेरों पर सबकी नजर टिक गई है. प्रधानमंत्री की इस यात्रा को दलित समाज तक मजबूत संदेश के तौर पर देखा जा रहा है. पंजाब में करीब 32 प्रतिशत आबादी दलित है. यह वर्ग चुनाव में बहुत अहम माना जाता है. बीजेपी लंबे समय से पंजाब में खुद को मजबूत करने की कोशिश कर रही है. लेकिन उसे अब तक बड़ी चुनावी जीत नहीं मिल पाई है.
बीजेपी पहले अकाली दल के साथ मिलकर सरकार में रही. 1997 से 2002 और 2007 से 2017 तक वह छोटे सहयोगी की भूमिका में थी. वह परंपरागत रूप से 117 में से 23 सीटों पर चुनाव लड़ती थी. तीन कृषि कानूनों के दौरान 2020 में अकाली दल ने गठबंधन तोड़ दिया. तब से बीजेपी अकेले अपनी जमीन बनाने की कोशिश कर रही है. लेकिन रास्ता आसान नहीं है.
हाल ही में पद्म श्री से सम्मानित डेरा बल्लन के प्रमुख से प्रधानमंत्री मिले. उन्होंने वहां समय बिताया और गुरु रविदास के समानता और सद्भाव के संदेश को दोहराया. इसे पंजाब के रविदासिया समाज तक पहुंच बनाने की बड़ी कोशिश माना जा रहा है. खासकर दोआबा इलाके की करीब 19 सीटों पर इसका असर माना जाता है. इससे पहले दिसंबर 2025 में डेरा प्रमुख ने दिल्ली में उनसे मुलाकात कर न्योता दिया था.
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि बीजेपी अभी दलित वोट बैंक में मजबूत पकड़ नहीं बना पाई है. पार्टी अकाली दल की सपोर्टर वाली अपनी पुरानी छवि से बाहर निकलना चाहती है. इसके लिए वह सिख नेताओं को पार्टी में ला रही है. विपक्ष इसे बाहर से लाए गए नेता बताता है. साथ ही पार्टी डेरों से नजदीकी भी बढ़ा रही है, क्योंकि डेरों का असर माना जाता है.
पंजाब के कई डेरा खुद को गैर राजनीतिक बताते हैं. वे कहते हैं कि उनका काम आध्यात्म और समाज सेवा है. लेकिन हकीकत यह है कि उनका चुनाव पर असर दिखता है. खासकर जाति आधारित वोटिंग में डेरों की भूमिका अहम मानी जाती है. पंजाब में दलित आबादी करीब 32 प्रतिशत है. इसमें रविदासिया और वाल्मीकि समुदाय सबसे बड़े समूह हैं. दोनों का वोट चुनाव की दिशा बदल सकता है. माना जाता है कि रविदासिया वोट पहले कांग्रेस को ज्यादा मिलता रहा. जबकि वाल्मीकि वोट बिखरा रहा और 2022 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को फायदा मिला.
पंजाब हमेशा से बीजेपी के लिए कठिन राज्य रहा है. हरियाणा से सीख लेते हुए पार्टी सामाजिक समीकरण बदलने की कोशिश कर रही है. इसी रणनीति में डेरों को अहम माना जा रहा है.

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