अल्पसंख्यक हिंसा, चीन का दखल और ढाका की अस्थिरता... संसद की रिपोर्ट में भारत-बांग्लादेश रिश्ते पर जताई ये चिताएं?
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कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली संसदीय समिति ने भारत–बांग्लादेश संबंधों पर 9वीं रिपोर्ट पेश की है. इसमें राजनीतिक अस्थिरता, सीमा सुरक्षा और व्यापारिक चुनौतियों को सबसे बड़ा खतरा बताया है. ढाका में राजनीतिक उथल-पुथल, अल्पसंख्यकों पर हमले और बांग्लादेश में चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच भारत-बांग्लादेश संबंधों को लेकर संसद की स्थायी समिति ने सरकार को सतर्क रहने की सलाह दी है.
भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को लेकर संसद की विदेश मामलों की स्थायी समिति ने एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की है. कांग्रेस सांसद शशि थरूर की अध्यक्षता वाली समिति ने 'भारत–बांग्लादेश संबंधों का भविष्य' विषय पर अपनी 9वीं रिपोर्ट में स्पष्ट किया है कि अगस्त 2024 के बाद बांग्लादेश में हुए घटनाक्रमों ने भारत के सामने अभूतपूर्व रणनीतिक, सुरक्षा और कूटनीतिक चुनौतियां खड़ी कर दी हैं. समिति ने कहा है कि इन हालात में भारत को निरंतर कूटनीतिक संवाद, सटीक रणनीतिक संचार और संस्थागत तालमेल को मजबूत करने की जरूरत है.
यह रिपोर्ट 16 दिसंबर 2025 को अपनाई गई. इससे पहले समिति ने विदेश मंत्रालय (MEA) से कई दौर की ब्रीफिंग ली थी, जिनमें 11 दिसंबर 2024 को विदेश सचिव के साथ विस्तृत चर्चा भी शामिल है. इसके अलावा 18वीं लोकसभा के 2024–25 और 2025–26 सत्रों के दौरान विषय विशेषज्ञों से भी विचार-विमर्श किया गया.
1971 की विरासत... रिश्तों की नैतिक नींव
समिति ने कहा है कि 1971 का मुक्ति संग्राम भारत-बांग्लादेश संबंधों की नैतिक और ऐतिहासिक आधारशिला है. यह साझा बलिदान, आपसी भरोसे और एकजुटता का प्रतीक है. रिपोर्ट में कहा गया है कि बांग्लादेश की आजादी में भारत की भूमिका और मुक्ति योद्धाओं को छात्रवृत्ति व चिकित्सा सहायता जैसे निरंतर सहयोग ने इन रिश्तों को वैधता दी है.
हालांकि समिति ने चिंता जताई कि बांग्लादेश में अब संशोधनवादी विचार उभर रहे हैं और युवा पीढ़ी के बीच 1971 में भारत की भूमिका को लेकर जागरूकता कम हो रही है. समिति ने विदेश मंत्रालय से कहा है कि रणनीतिक जन कूटनीति, शैक्षणिक आदान-प्रदान, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाकर 1971 की भावना को जीवित रखा जाए.
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