
अभी कितने इम्तेहान बाकी हैं, ये 'स्ट्रगल' खत्म क्यों नहीं होता? BEd खत्म होने से अभ्यर्थी निराश, बताया दर्द
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एक वक्त था जब सबसे ज्यादा टीचर बनने की सलाह दी जाती थी. घरवाले कहते थे, बीएड कर लो और फ्यूचर सेफ. जो लोग ये सलाह मान बैठे आज वो खुद को मजबूर समझ रहे हैं. जब से सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि बीएड डिग्री धारक अब प्राथमिक शिक्षक नहीं बन सकेंगे. तब से ये बीएड अभ्यर्थी और निराश हो गए हैं. जानिए- वो क्या कह रहे हैं?
"मैंने एग्जाम पर एग्जाम दिए. 3 बार CTET निकाला, मेरी पत्नी बीएएसी बीएड बीटीसी हैं, वो भी CTET निकाल चुकी हैं. सरकारी नौकरी की आस में तैयारी में जुटे रहे. कभी दूसरे फील्ड को नहीं चुना. आज अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा." हरिद्वार के प्रदीप और उनकी पत्नी बीएड करने के बावजूद खुद को बिना किसी डिग्री के मान रहे. प्रदीप की तरह ही हजारों अभ्यर्थी बीएड की योग्यता प्राइमरी में खत्म होने के बाद से निराश हैं.
अगस्त से 41 साल के हो गए प्रदीप ने बताया कि मैंने साल 2015 से 2017 तक बीएड किया था. तब से कहीं भी भर्ती नहीं हुई. उत्तराखंड के हरिद्वार के रहने वाले बीएड पास प्रदीप अपना दर्द बयां करते हुए कहते हैं कि बहुत मेहनत की. पहले तो डेढ़ साल बाद बीएड का रिजल्ट आया. अच्छे प्रतिशत आने के बाद भी आज 6 साल होने वाले हैं, सरकार ने कोई वैकेंसी नहीं निकाली. फिर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आता है कि बीएड पास छात्र प्राइमरी कक्षाओं को पढ़ाने के लिए एलिजिबल नहीं हैं. अब तो ऐसा लगता है कि हम क्या करेंगे. हमारी तो दुनिया ही लुट गई.
मजदूर से कम है कमाई प्रदीप और उनकी पत्नी सुनीता दोनों स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर गुजारा करते हैं. पत्नी सुनीता 5-12वीं क्लास के बच्चों को इंग्लिश और कैमेस्ट्री पढ़ाती हैं. वहीं प्रदीप भी जूनियर के बच्चों को साइंस पढ़ाते हैं. प्रदीप के घर में उनकी पत्नी, दो बेटियों के साथ-साथ एक बड़ा भाई, बड़े भाई की पत्नी और उनकी तीन बेटियां हैं. वहीं गांव में बूढ़े मां-बाप हैं जो बच्चों की सरकारी नौकरी की उम्मीद में बैठे हैं. माता-पिता की जिम्मेदारी भी जैसे तैसे करके प्रदीप और उनके भाई निभा रहे हैं. इनकम की बात आने पर प्रदीप बताते हैं कि घर चलने जितनी कमाई हो जाती है. यह समझ लीजिए कि ट्यूशन से जैसे तैसे करके 8 हजार रुपये तक मिलते हैं जो कि असल में मजदूर या राजमिस्त्री की कमाई से भी कम हैं.
चाय की दुकान भी खोलने में शर्म आती है नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 के तहत अब बीएड को 4 साल का कोर्स कर देने पर प्रदीप कहते हैं कि अब तक कोई वैकेंसी नहीं आई. अब बीएड को भी 4 साल का कर दिया, अब हमारी उम्र इतनी उम्र हो गई है, और कितना पढ़ेंगे. इतना पढ़-लिखकर चाय की दुकान भी खोलने में शर्म आती है. प्रदीप कहते हैं कि हमारी सरकार से मांग है कि सबसे पहले बीएड पास छात्रों पर जो प्राइमरी स्कूल को ना पढ़ा पाने की पाबंदी लगी है उसे हटाया जाए. अब तक कोई नौकरी नहीं निकली, हमारा समय बर्बाद हुआ इसलिए उम्र भी बढ़ा देनी चाहिए. जैसे हर साल पेपर होता है उसी तरह हर साल वैकेंसी भी निकालनी चाहिए.
प्रदीप बताते हैं कि मैंने इस बीच कंप्यूटर हार्डवेयर वर्किंग का डिप्लोमा भी किया लेकिन टीचर बनने का सपना दिमाग पर हावी था. पहले जूनियर भर्ती का एग्जाम दिया था, वो पेंडिंग में रह गया. इसके बाद PET का एग्जाम दो बार क्लीयर किया. यही नहीं बैंक में नौकरी के लिए 7-8 एग्जाम दिए, लेकिन पास होने के बावजूद मेरिट में कभी आ नहीं पाया.
हम जैसे टीचर की वैल्यू हो गई जीरो मेरे पढ़ाए हुए कितने लोग पुलिस में हो गए, बैंकों में हो गए लेकिन मुझ पर बस टीचर बनने की ही धुन सवार रही. पहले तो कोचिंग पढ़ाकर भी गुजारा हो जाता था, लेकिन कोरोना के बाद तस्वीर बदल गई. अब बड़े बड़े ब्रांडेड इंस्टीट्यूट से ऑनलाइन का चलन इतना बढ़ा है कि बच्चे छोटे इंस्टीट्यूट में नहीं आते. इस बीच जाने कितने इंस्टीट्यूट बंद हो गए. मैं जहां कोचिंग पढ़ाता था वो इंस्टीट्यूट भी बंद हो गए. ऐसे में सच पूछिए तो हम जैसे टीचर की वैल्यू जीरो हो गई.

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