अखलाक लिंचिंग के बाद उन्नाव रेप केस... आरोपियों और दोषियों को किस बात की 'राहत'?
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21 जनवरी मंगलवार का दिन कोर्ट से आई दो खबरों का दिन था. कोर्ट एक मामले में दोषी पर रहम करती नजर आ रही थी, तो दूसरे मामले में यूपी सरकार ही आरोपियों के पक्ष में पैरवी कर रही थी. जाहिर है कि सवाल तो उठेंगे ही.
भारतीय न्याय व्यवस्था में न्याय की प्रक्रिया लंबी और जटिल होती है, लेकिन जब हाई-प्रोफाइल मामलों में आरोपी या दोषी व्यक्तियों को बार-बार 'राहत' मिलती है, तो यह सवाल उठता है कि क्या न्याय पीड़ितों के लिए है या अपराधियों के लिए? 2015 में दादरी में मोहम्मद अखलाक की लिंचिंग से लेकर 2017 के उन्नाव रेप केस तक, ऐसे कई मामले हैं जहां शुरुआती जांच, गिरफ्तारी और यहां तक कि सजा के बाद भी आरोपियों को विभिन्न आधारों पर जमानत या अन्य राहत मिल जाती है.
उत्तर प्रदेश सरकार ने अखलाक लिंचिंग मामले में आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने की कोशिश की, जबकि उन्नाव रेप केस में दोषी कुलदीप सिंह सेंगर की सजा दिल्ली हाईकोर्ट ने सस्पेंड कर दी. ये घटनाएं न केवल पीड़ित परिवारों के घावों को कुरेदती हैं, बल्कि समाज में एक गलत संदेश भी देती हैं कि शक्तिशाली लोग कानून से ऊपर हैं. सवाल यह है कि ऐसी 'राहत' देने का आधार जो भी हो, समाज पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है?
अखलाक लिंचिंग मामला: एक दशक बाद भी न्याय की तलाश
2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी के बिसाहड़ा गांव में मोहम्मद अखलाक को गौहत्या के संदेह में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था. हमले में उनका बेटा भी गंभीर रूप से घायल हुआ था. पुलिस जांच में 19 लोगों को आरोपी बनाया गया, जो कई स्थानीय भाजपा नेताओं से जुड़े थे. 2018 में अदालत ने कुछ आरोपियों को दोषी ठहराया, लेकिन अपील की प्रक्रिया में कई को जमानत मिल गई.
अब, 2025 में, जब घटना को 10 साल हो चुके हैं, उत्तर प्रदेश सरकार ने आश्चर्यजनक रूप से मुकदमा वापस लेने की याचिका दायर की. सूरजपुर जिला अदालत ने हालांकि इस याचिका को खारिज कर दिया है, लेकिन सरकार की इस कोशिश ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. अखलाक के परिवार ने इस कदम का विरोध किया है, और कहा है कि अगर जरूरी हुआ तो वे हाईकोर्ट जाएंगे.
परिवार का कहना है कि यह कदम राजनीतिक दबाव के कारण उठाया जा रहा है, क्योंकि आरोपी स्थानीय प्रभावशाली लोग हैं. क्या यह 'राहत' इसलिए दी जा रही है क्योंकि मामले में राजनीतिक कनेक्शन हैं? या फिर गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा को जायज ठहराने की कोशिश है? इस मामले में शुरुआती जांच में मांस की फॉरेंसिक रिपोर्ट से साबित हुआ कि अखलाक के घर में बीफ नहीं था, बल्कि मटन था.

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