
Ram Mandir Ayodhya: सोने की छेनी, चांदी की हथौड़ी से गढ़ी गईं आंखें... जानिए कैसे तैयार हुआ रामलला का दिव्य-भव्य स्वरूप
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सुमधुर शास्त्री ने नेत्र मिलन और नेत्र निर्माण की बारीकियों को बहुत विस्तार से बताया है. उन्होंने कहा कि प्रतिमा के नेत्र विशेष मूहूर्त में तैयार किए जाते हैं. नेत्र गढ़ने की परंपरा बहुत विशेष है. कर्मकूटि की विधान पूजा के बाद स्वर्ण की छेनी और चांदी की हथौड़ी से देवता की आंखें गढ़ी गईं.
अयोध्या के श्रीराम मंदिर में रामलला गर्भगृह में स्थापित हो चुके हैं. रामलला पहले प्रतिमा स्वरूप थे और अब प्राण प्रतिष्ठा के बाद वह देवस्वरूप हो गए हैं. महज प्रतिमा से सहज देव बनने के इस सफर के साक्षी रहे हैं- संस्कृत और संगीत के विद्वान सुमधुर शास्त्री, जिन्होंने रामलला को गढ़ते देखा है. आजतक से विशेष बातचीत में उन्होंने बताया कि अरुण योगीराज ने पिछले सात महीनों में कई बार आधी-आधी रात में उन्हें जगाया और कहते थे कि आप साथ चलिए लल्ला मुझे बुला रहे हैं. फिर वो घंटों तक एक-एक एंगल से लल्ला को निहारते थे और कई बार तो भोर भी कर देते थे.
रामलला की स्थापना थी बड़ी जिम्मेदारी
सुमधुर शास्त्री ने कहा, यह निश्चिच रूप से बड़ा विषय था. इतने बड़े संघर्ष के बाद देवता को प्रतिष्ठित करना एक बड़ी जिम्मेदारी थी. उन्होंने कहा कि बाल्यकाल से संघ के स्वयंसेवक रहे, अब साकेत महाविद्यालय में संगीत प्रवक्ता हैं तो जब इस कार्य के लिए ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय ने बुलाया तो एहसास नहीं था कि इतनी बड़ी जिम्मेदारी दी गई है, लेकिन जो बातचीत हुई, उससे गंभीरता समझ में आई. मेरा सौभाग्य है कि मैंने प्रभु रामलला को शिलारूप से प्रकट होते देखा है.
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सबसे आखिरी में अरुण योगिराज ने किया शिलापूजन
श्रीरामलला के विग्रह निर्माण को लेकर उन्होंने कहा कि सबसे पहले सत्यनारायण पांडे का नाम आया और फिर जीएल भट्ट का नाम सामने आया. बल्कि शिला पूजन भी पहले जीएल भट्ट ने किया, फिर सत्यनारायण पांडेय ने किया. इसके बाद आखिरी में अरुण योगीराज ने शिला पूजन किया. तीनों ही मूर्तिकार अपनी पद्धति से, कला का प्रदर्शन करने में प्रतिबद्धता से लगे रहे.

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