
खार्ग आइलैंड, होर्मुज और अमेरिका की फांस... क्यों दोस्तों को भी नहीं समझा पा रहे ट्रंप?
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ईरान-अमेरिका तनाव के बीच होर्मुज स्ट्रेट पर संकट गहराया गया है. क्यों अमेरिका को नाटो देशों से मदद मांगनी पड़ी, क्यों दुनिया के 20% तेल की सप्लाई खतरे में है और कैसे पूरी दुनिया पर पड़ सकती है महंगाई की मार? जानिए पूरी कहानी.
18 दिन पहले ईरान पर हमला जिस अमेरिका और इजरायल खासकर अमेरिका ने इसे एक बेहद आसान जंग बताया था वही आसान जंग अब खासतौर पर अमेरिका के लिए सबसे मुश्किल जंग बन गई है. इतनी मुश्किल कि अब अमेरिका को खुलकर नाटो देशों से मदद मांगनी पड़ रही है. खासकर नाटो देशों की नेवी की. ताकि उस होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता साफ किया जा सके जिस रास्ते से होकर दुनिया के बाजार में 20 फीसदी कच्चा तेल पहुंचता है. दुनिया की सबसे बड़ी और ताकतवर नेवी रखने का दावा करने वाले अमेरिका को आखिर अब नाटो देशों की नेवी की जरूरत क्यों पड़ गई? और पड़ी तो पड़ी नाटो देशों ने होर्मुज स्ट्रेट के रास्ते पर अपने जंगी जहाजों को भेजने से साफ इनकार क्यों कर दिया? इससे भी बड़ा सवाल ये कि खुद को सुपरपावर करने वाला अमेरिका समंदर के एक छोटे से रास्ते के आगे इतना बेबस कैसे हो गया?
दो तस्वीरों में अमेरिकी बेबसी की पूरी कहानी नजर आती है. पहली तस्वीर मतलब होर्मुज स्ट्रेट, जहां से कच्चे तेल का करीब 20 फीसदी हिस्सा दुनिया के अलग अलग देशों में पहुंचता है. और दूसरी तस्वीर मतलब खार्ग आईलैंड, जहां से ईरान का 90 फीसदी तेल दुनिया के बाजारों में पहुंचता है. इस खार्ग आईलैंड को फारस की खाड़ी का अनाथ मोती भी कहा जाता है.
बस यूं समझ लीजिए कि अमेरिका और इजरायल ने ईरान के साथ जिस जंग की शुरुआत खामेनेई के तख्तापलट के लिए की थी वो जंग धीरे धीरे अब इन दो इलाकों में सिमट आई है. एक होर्मुज और दूसरा खार्ग. होर्मुज की वजह से एशिया और यूरोप के तमाम देशों में तेल और गैस की ना सिर्फ कमी होती जा रही है बल्कि दाम आसमान छूते जा रहे हैं.
चूंकि ये अमेरिका की वजह से हो रहा है लिहाजा ज्यादातर देश अब ईरान पर अमेरिकी हमले के फैसले को लेकर ना सिर्फ सवाल उठाने लगे बल्कि खुद अमेरिका अब दबाव में आ गया है. दूसरा इलाका ये खार्ग आईलैंड है. ईरान की लाइफलाइन. जहां से ईरान का 90 फीसदी कच्चा तेल पूरी दुनिया में पहुंचता है. इस खार्ग आईलैंड पर अमेरिका ने बमबारी भी की लेकिन बमबारी के फौरन बाद अमेरिका ये सफाई भी देता है कि खार्ग आईलैंड पर बमबारी सिर्फ और सिर्फ सैन्य ठिकानों को बर्बाद करने के लिए किया गया. तेल के ठिकानों पर नहीं.
असल में अमेरिका जानता है कि अगर ईरान की लाइफलाइन यानि खार्ग आईलैंड के तेल के ठिकानों पर हमला हुआ तो पूरी दुनिया में ना सिर्फ तेल के लिए हाहाकार मच जाएगा, बल्कि तेल के दाम आसमान छूने लगेंगे. इससे मंहगाई भी हद से ज्यादा बढ़ जाएगी. ऐसे में दुनिया के ज्यादातर देश अमेरिका को अपना दुश्मन मानने लगेंगे. वैसे भी ईरान पहले ही धमकी दे चुका है कि अगर खार्ग द्वीप पर तेल के ठिकानों को बर्बाद किया गया तो वो खाड़ी के देश के तमाम तेल के कुओं में आग लगा देगा. अगर ऐसा हुआ तो अंदाजा लगाइए पूरी दुनिया में तेल और गैस को लेकर कैसा हाहाकार मचेगा.
बस यही वजह है कि ज्यादातर नाटो देशों ने होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता खुलवाने के लिए अपने जंगी जहाज या अमेरिका की मदद करने से साफ इनकार कर दिया है. इनकार करने वाले देशों में ब्रिटने, ऑस्ट्रेलिया, जापान, फ्रांस, साउथ कोरिया, जर्मनी, इटली और यूरोपियन यूनियन शामिल है. दरअसल इन देशों को भी पता है कि होर्मुज स्ट्रेट का रास्ता खुलवाना इतना आसान नहीं है. होर्मुज का रास्ता बेहद छोटा और संकरा समुद्री रास्ता है.

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