
विश्व जल दिवस: फाइलों में 'हर घर जल', पर विदर्भ से बुंदेलखंड तक 'प्यासा' है भारत!
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विश्व जल दिवस पर 'जल है तो कल है' जैसे नारे सुनने में तो अच्छे लगते हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत आज भी बहुत कड़वी है. सरकारी कागजों में 'हर घर जल' के बड़े-बड़े दावे तो दिखते हैं, पर असलियत में आज भी लोगों को प्यास बुझाने के लिए दूर-दूर तक पैदल चलना पड़ रहा है. कई परिवारों को तो पानी के लिए खुद कुएं तक खोदने पड़ रहे हैं. जब तक पानी के लिए यह जानलेवा संघर्ष और लंबी कतारें खत्म नहीं होतीं, तब तक ये जल दिवस सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख बनकर ही रह जाएगा.
22 मार्च, तारीख वही है, जो हर साल आती है. नाम भी वही विश्व जल दिवस. लेकिन जरा इस दिन को कैलेंडर से निकालकर जमीन पर रखकर देखिए, तो तस्वीर बदल जाती है. कहीं इस दिन स्कूल में बच्चे 'जल है तो कल है' लिख रहे होते हैं, तो कहीं उसी वक्त एक औरत सिर पर खाली बाल्टी रखे 2 किलोमीटर दूर पानी ढूंढने निकल चुकी होती है. यहीं से असली कहानी शुरू होती है. क्योंकि पानी इस देश में सिर्फ बहता नहीं… ढोया भी जाता है.
कहानी की शुरुआत करते हैं महाराष्ट्र के विदर्भ से. विदर्भ का नाम आते ही जेहन में सफेद कपास की तस्वीर उभरती है, लेकिन गर्मियों में यहां की हकीकत कुछ और ही होती है. जैसे ही यहां गर्मी दस्तक देती है, तापमान काफी बढ़ जाता है और पारा 44-45 डिग्री के पार पहुंच जाता है. एक रिपोर्ट मुताबिक, गर्मी के साथ ही यहां पानी का गहरा संकट खड़ा हो जाता है.
विदर्भ के यवतमाल जिले की परधी बस्तियों में हालात सबसे ज्यादा खराब हो जाते हैं. इस दौरान यहां की महिलाओं के लिए पानी लाना किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं होता. घर की प्यास बुझाने के लिए उन्हें रोजाना धूप में 2 से 3 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है.
ये दूरी सिर्फ किलोमीटर में नहीं नापी जाती. ये थकान में मापी जाती है, वक्त में मापी जाती है और कभी-कभी उस खामोशी में भी, जो कंठ सूखने से पैदा होती है. कई बार पानी के लिए उन्हें गहरे, खुले कुओं में उतरना पड़ता है. जोखिम बहुत बड़ा है, लेकिन घर की प्यास बुझानी है तो जाना ही पड़ता है. प्यास के आगे जान का खौफ भी हार जाता है.
अब चलते हैं बुंदेलखंड. यहां के रहने वाले मानवेंद्र से जब हमने पानी के संघर्ष की बात की, तो उन्होंने एक ऐसी कहानी साझा की जो भीतर तक हिला देती है. यह कहानी है टीकमगढ़ जिले के जमुनिया खेड़ा गांव के एक बुजुर्ग दंपत्ति दीपचंद सौर और उनकी पत्नी गौराबाई की. उम्र ढल चुकी है, लेकिन संघर्ष की कहानी अभी भी चल रही है. इनके पास करीब 7 एकड़ जमीन है, लेकिन पानी की कमी ने खेती को आधा कर दिया.
पानी के लिए इन्होंने एक-दो नहीं, पूरे पांच कुएं खोदे. तीन कुओं ने तो सिर्फ पत्थर और सूखी धूल ही दी. दो में थोड़ा पानी मिला भी, तो वह बस नाम भर का था. आप जरा सोचिए, पांच बार जमीन खोदना, पांच बार नई उम्मीद जगाना और हर बार किस्मत का वही आधा-अधूरा जवाब मिलना.

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