
Laalo Krishna Sada Sahaayate Review: न ओवरड्रामा... न शोर, दिल से जुड़ती है 'लालो', कमाल है फिल्म
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गुजराती सिनेमा का जादू हिंदी सिनेमा की दुनिया में छा चुका है, ये कहना गलत नहीं होगा. 50 लाख को छोटे से बजट में बनी फिल्म ‘लालो: श्रीकृष्ण सदा सहायते’ ने अकेले गुजरात में ही 100 करोड़ का कलेक्शन कर लिया. इसकी तारीफ नॉर्थ तक पहुंची तो हिंदी में रिलीज करने की मांग हुई. फिर क्या था, हमने भी देख ही लिया कि फिल्म में क्या खास है. आइये आपको भी बताते हैं.
गुजराती सिनेमा से आई फिल्म ‘लालो: श्रीकृष्ण सदा सहायते’ ने वो कर दिखाया है, जो बड़े-बड़े बजट वाली फिल्में भी नहीं कर पातीं. महज़ 50 लाख रुपये के बजट में बनी इस फिल्म ने गुजरात में 100 करोड़ रुपये से ज्यादा की कमाई कर इतिहास रच दिया है. अब फिल्म हिंदी में रिलीज़ हुई है और साफ है कि इसका असर भाषा की सीमा से कहीं आगे जाता है. ये बताती है कि एक अच्छी कहानी कैसे अपनी सीमाएं लांघना जानती है.
श्रीकृष्ण का लाल 'लालो'
फिल्म की कहानी एक आम आदमी लालो के इर्द-गिर्द घूमती है, जो पेशे से ऑटो ड्राइवर है. उसकी जिंदगी संघर्षों से भरी है, वो कर्ज में डूबा हुआ है, लेकिन बजाए उन मुश्किलों को दूर करने के वो तथाकथित दोस्तों के कहने पर 'घर का मर्द' बनने चला है. वो जिम्मेदारियों से भागता नहीं है, लेकिन उन्हें निभाना भी नहीं जानता. वो भटका हुआ है. बावजूद इसके लालो को श्रीकृष्ण पर अटूट विश्वास है- यही उसकी सबसे बड़ी ताकत है.
'मर्द' बनने का उसका ये गुरूर तब टूटता है, जब वो एक वीरान घर में फंस जाता है. यहां उसकी मदद के लिए आगे आते हैं- यशोदा के लाल श्रीकृष्ण. वो महाभारत कृष्ण की तरह उसे राह दिखाते हैं, सच के रास्ते पर लाते हैं, उसकी असल ताकत का एहसास कराते हैं.
घर की शोभा 'तुलसी' के पास है हर समस्या का हल
फिल्म लालो के अलावा और भी कई पहलू पर बात करती है. इसमें से एक है तुलसी यानी लालो की पत्नी का किरदार. पति के गायब हो जाने के बाद वो खुद को कोसती है, हर किसी के आगे मदद को हाथ फैलाती है, फिर जिंदगी से हारकर खुद की और बेटी की जिंदगी खत्म करने का फैसला करती है. लेकिन गिरिधर गोपाल उसे भी राह दिखाते हैं. एहसास दिलाते हैं कि किसी के चले जाने से जिंदगी खत्म नहीं होती, एक महिला अपने आप में अपना घर संभालने में सक्षम है.













