
Gold-Silver Crash: अचानक सोना-चांदी ऐसे हुआ क्रैश... आ गई 1980 की याद, जानिए वजह
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Gold-Silver Price Crash Like 1980: सोना और चांदी के निवेशकों को शुक्रवार को बड़ा झटका लगा और दोनों कीमतें धातुएं क्रैश हो गई. इस बीच चांदी की कीमत आई इस गिरावट ने 1980 की याद ताजा कर दी, जिसे 'सिल्वर थर्सडे' के रूप में जाना जाता है.
सोना-चांदी की कीमतों शुक्रवार को देखते ही देखते क्रैश (Gold-Silver Price Crash) हो गई. कॉमैक्स, एमसीएक्स से लेकर घरेलू मार्केट में भी गोल्ड सिल्वर अचानक काफी सस्ता (Gold-Silver Cheaper) हो गया. सिल्वर प्राइस में तो एक दिन की सबसे बड़ी गिरावटों में एक देखने को मिली और ये झटके में 30% से ज्यादा टूट गई. इस गिरावट के बाद साल 1980 की याद ताजा हो गई, उस समय भी Silver Rate बुरी तरह फिसला था, जिसे 'सिल्वर थर्सडे' के तौर पर याद किया जाता है. ठीक उस समय जैसा हाहाकार शुक्रवार को आई गिरावट के बाद चांदी के निवेशकों में दिख रहा है.
सोना-चांदी देखते ही देखते क्रैश
सबसे पहले बात करते हैं Gold-Silver प्राइस क्रैश के बारे में, तो बीते गुरुवार को ये कीमती धातुएं रॉकेट की रफ्तार के भाग रही थीं और पहली बार चांदी ने जहां 4 लाख रुपये प्रति किलोग्राम का ऐतिहासिक स्तर पार कर लिया था, तो वहीं सोने का भाव भी 1.90 लाख रुपये प्रति 10 ग्राम के पार निकल गया था. फिर शुक्रवार को अचानक इसमें गिरावट का ऐसा सिलसिला शुरू हुआ, कि एमसीएक्स पर 5 मार्च की एक्सपायरी वाली एक किलो चांदी का वायदा भाव (1 Kg Silver Price) पिछले बंद के मुकाबले 1,07,971 रुपये कम हो गया. वहीं अपने हाई लेवल 4,20,048 रुपये प्रति किलो की तुलना में Siver Price Crash होकर 2,91,922 रुपये पर आ गया. यानी ये झटके में 1,28,126 रुपये सस्ती हो गई.
सोने के भाव की बात करें, तो 2 अप्रैल की एक्सपायरी वाला 10 Gram 24 Karat Gold Rate में गुरुवार के बंद के मुकाबले शुक्रवार को 33,113 रुपये सस्ता हुआ और 1,83,962 रुपये से 1,50,849 रुपये प्रति 10 ग्राम पर आ गया. वहीं अपने हाई लेवल 1,93,096 रुपये से ये 42,247 रुपये प्रति 10 ग्राम सस्ता हो गया.
क्यों आ गई 1980 की याद?

आज पूरी दुनिया LNG पर निर्भर है. खासकर भारत जैसे देश, जहां घरेलू गैस प्रोडक्शन कम है, वहां LNG आयात बेहद जरूरी है. लेकिन जैसे ही युद्ध या हमला होता है, सप्लाई चेन टूट जाती है और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं. कतर जैसे देशों से निकलकर हजारों किलोमीटर दूर पहुंचने तक यह गैस कई तकनीकी प्रोसेस और जोखिम भरे रास्तों से गुजरती है.












