
AI के दौर में बदलती नौकरियां, इस तरह करें डर की तैयारी, डिग्री से ज्यादा जरूरी ये चीज
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AI के बढ़ते प्रभाव को लेकर लोगों के मन में एक ही सवाल है कि क्या इससे सभी की नौकरियां चली जाएंगी और AI की सारा काम कर लेगा. ऐसे में चलिए जानते हैं AI से कितना असर पड़ने वाला है.
आज की कंपनियां AI के यूज पर ज्यादा फोकस कर रही हैं. ये हमारी रोजमर्रा की जिंदगी और कामकाज का हिस्सा बन चुकी है. इस बीच नौकरियों को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है. पहले जहां लोगों को नौकरियां जाने का डर सता रहा था, वहीं अब लोग इसे स्वीकार कर इस बात पर फोकस कर रहे हैं कि इस बदलाव के लिए खुद को कैसे तैयार करें. एक्सपर्ट्स का मानना है कि AI के दौर में भारत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हमारा वर्क फोर्स कितनी जल्दी नए स्किल सीखता और इसे अपनाता है.
AI के कारण कंपनियों में तेजी से हो रहे बदलावों के बीच भारत का वर्क फोर्स एक अहम मोड़ पर खड़ा है. वैश्विक रिसर्च के अनुसार, 2030 तक ऑटोमेशन के चलते लगभग 40 प्रतिशत नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं. ऐसे में सवाल यह नहीं है कि AI काम करने के तरीके को बदलेगा या नहीं बल्कि यह है कि क्या कर्मचारी इस बदलाव के लिए तैयार होंगे.
स्किल पर होगा फोकस
माइक्रोसॉफ्ट इंडिया समेत कई बड़ी टेक कंपनियां लगातार यह कह रही हैं कि AI के दौर में सिर्फ डिग्री होना काफी नहीं होगा. अब जरूरत है काम करने की क्षमता (स्किल्स) की है. विशेषज्ञों का कहना है कि भारत को अब डिग्री पर निर्भरता छोड़ स्किल-आधारित शिक्षा की ओर जाना होगा. क्योंकि AI के कारण काम की प्रकृति तेजी से बदल रही है और ऐसे में खुद को ढालने की क्षमता सबसे बड़ा हुनर बन जाएगी.
स्किल डेवलपमेंट ही है रियल पॉवर
आम लोगों की सोच के विपरीत, AI इंसानों की नौकरी तुरंत नहीं छीनेगा. यह धीरे-धीरे हमारे काम करने के तरीकों को बदलेगा. जिन नौकरियों में बार-बार एक ही तरह का काम होता है, उन पर अधिक असर पड़ेगा. लेकिन जिन कामों में सोचना, फैसला लेना और परेशानी हल करना शामिल है, वे खत्म नहीं होंगे बल्कि और बेहतर बनेंगे. इसे लेकर टीमलीज डिग्री अप्रेंटिसशिप के सीईओ डॉ. निपुण शर्मा कहते हैं कि नई स्किल्स सीखना बहुत जरूरी है. जब लोग AI टूल्स को सही तरीके से इस्तेमाल करना और उनके नतीजों को समझना सीख लेते हैं, तो AI डर की चीज नहीं रहता बल्कि काम को आसान और तेज बना देता है.

आज पूरी दुनिया LNG पर निर्भर है. खासकर भारत जैसे देश, जहां घरेलू गैस प्रोडक्शन कम है, वहां LNG आयात बेहद जरूरी है. लेकिन जैसे ही युद्ध या हमला होता है, सप्लाई चेन टूट जाती है और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ जाती हैं. कतर जैसे देशों से निकलकर हजारों किलोमीटर दूर पहुंचने तक यह गैस कई तकनीकी प्रोसेस और जोखिम भरे रास्तों से गुजरती है.












