
हर 10 में एक महिला डिप्रेशन में, लेकिन पुरुषों की आत्महत्या दोगुनी, मिडिल-एज क्यों सबसे ज्यादा जोखिम में?
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नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) ने साल 2023 में हुई खुदकुशी को लेकर रिपोर्ट जारी की. इसमें कई अलग-अलग बातें और पैटर्न दिखे. उम्र पर ध्यान दें तो 30 से 45 साल के लोगों ने सबसे ज्यादा सुसाइड किए. वहीं महिलाओं की तुलना में लगभग तीन गुना पुरुषों ने मौत को गले लगाया. पूरी दुनिया में पुरुषों की आत्महत्या की दर, महिलाओं से दोगुनी या उससे ज्यादा है.
दुनिया भर में खुदकुशी का ग्राफ ऊपर जा रहा है. इसमें भी महिलाओं की तुलना में पुरुषों के आत्महत्या की दर ज्यादा रहती है. नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) ने हाल में क्राइम पर एक डेटा जारी किया. इसमें आत्महत्या में यही पैटर्न दिखा. दो साल पहले 30 से 45 साल की उम्र के 43 हजार पुरुषों और 12 हजार महिलाओं ने आत्महत्या की है. ये हैरान करने वाला इसलिए है क्योंकि महिलाओं में डिप्रेशन की दर और आत्महत्या की प्रवृति भी ज्यादा दिखती है.
वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) की मानें तो हर साल सात लाख से ज्यादा लोग खुदकुशी कर लेते हैं. इसमें भी पुरुषों के ऐसा कदम उठाने का प्रतिशत महिलाओं से काफी ज्यादा रहा. अमेरिका को ही देखें तो वहां मेल सुसाइड, महिलाओं की तुलना में चार गुना से भी ज्यादा रहा. ऑस्ट्रेलि्या में तिगुनी, जबकि ज्यादातर देशों में ये दर दोगुनी है. भारत में भी यही दिखता है.
इस डेटा पर लंबे समय से बहस होती रही. डिप्रेशन और कई किस्म के सामाजिक-आर्थिक भेदभाव झेलती महिलाओं की तुलना में पुरुषों में आत्महत्या की दर ज्यादा क्यों!
दुनियाभर में महिलाओं में डिप्रेशन के केस पुरुषों से ज्यादा दिखते हैं. WHO के अनुसार, ग्लोबली महिलाओं में डिप्रेशन की आशंका पुरुषों से करीब डेढ़ से दोगुना होती है. हालिया आंकड़ों के हिसाब से वैश्विक स्तर पर अगर 10 महिलाओं को लें, तो उनमें से 1 महिला किसी न किसी रूप में डिप्रेशन का सामना कर रही है. इसके कई कारण हैं. जैसे हार्मोनल बदलाव, सोशल प्रेशर, और घर-बाहर संभालने की जिम्मेदारी. दुनिया के कई देश ऐसे हैं, जहां महिलाओं को बाहर निकलने तक की आजादी नहीं. उनके लिए हेल्थकेयर सिस्टम भी नहीं है. ये सब वजहें घुल-मिलकर अवसाद की वजह बन जाती हैं. साल 2021 में WHO ने माना था कि ग्लोबली 51 करोड़ पुरुषों की तुलना में 58 करोड़ से ज्यादा स्त्रियां अवसाद में हैं.
भारत में भी यही ट्रेंड है. नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे के मुताबिक, भारत में ज्यादातर डिप्रेशन पेशेंट महिलाएं होती हैं. कई बार वे परिवार और समाज की वजह से खुलकर अपनी परेशानी नहीं बता पातीं, इसलिए केस दबे रह जाते हैं. एक अच्छी बात ये है कि महिलाएं मानसिक समस्या के लिए मदद लेने में पुरुषों से कुछ आगे रहती हैं, जिससे डेटा में उनके केस ज्यादा दर्ज भी होते हैं.
अवसादग्रस्त महिलाएं खुदकुशी की कोशिश में भी आगे हैं, लेकिन इससे होने वाली मौतों में पुरुष आगे दिखते हैं. ये फर्क सुसाइड अटेम्प्ट और सुसाइड डेथ का है.

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