
सच या झूठ... पिता के हर दावे की पड़ताल, खड़े हुए सवाल तीनों बहनों का सवाल रात में ही क्यों किया अंतिम संस्कार
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गाजियाबाद की भारत सिटी सोसायटी में तीन नाबालिग बहनों की आत्महत्या के मामले में पुलिस हर दावे की गहन जांच कर रही है. कोरियाई ऐप की लत का पिता का दावा फिलहाल सबूतों से मेल नहीं खाता. बरामद डायरी घरेलू तनाव की ओर इशारा करती है. पोस्टमॉर्टम के बाद देर रात हुए अंतिम संस्कार पर भी सवाल उठे हैं, हालांकि पुलिस इसे पारिवारिक निर्णय मान रही है.
गाजियाबाद की भारत सिटी सोसायटी में नौवीं मंजिल कूदकर जान देने वाली तीन नाबालिग बहनों के केस में पुलिस हर एंगल पर जांच कर रही है. हर उस दावे पर गहनता से पड़ताल की जा रही है जो घटना के बाद से किए जा रहे हैं. पोस्टमार्टम के बाद पिता ने तीनों बेटियों को मुखाग्नि दी हालांकि देर रात में हुए अंतिम संस्कार पर भी कुछ लोग सवाल खड़े कर रहे हैं, पुलिस ने भी इस सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश की है.
तीनों बहनों के पोस्टमॉर्टम के बाद बुधवार को यमुना नदी के तट पर स्थित दिल्ली के निगम बोध घाट पर तीनों के शवों का अंतिम संस्कार किया गया.शालीमार गार्डन के अतिरिक्त पुलिस आयुक्त अतुल कुमार सिंह ने एक न्यूज एजेंसी को बताया कि अंतिम संस्कार उनके पिता ने किया.एसीपी ने कहा, यह पता नहीं चल पाया है कि बुधवार रात को ही अंतिम संस्कार क्यों किया गया.यह उनके निजी कारणों से हो सकते है.उन्होंने यह भी बताया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट में पुष्टि हुई है कि तीनों की मौत सिर में गंभीर चोट लगने से हुई.गाजियाबाद के पुलिस अधिकारियों का कहना है कि अंतिम संस्कार रात में ही करने के पीछे कोई संदिग्ध कारण सामने नहीं आया है और यह परिवार का निजी निर्णय हो सकता है.लेकिन फिर भी सवाल उठते हैं कि इतनी बड़ी घटना के बाद इतनी जल्दी यह फैसला क्यों लिया गया.
दावे से मेल नहीं खाते पिता के बयान
वैसे घटना को शुरुआत में कोरियाई गेम की लत से जोड़कर देखा गया, उसी कहानी पर अब सबसे पहले सवाल खड़े हो रहे हैं.पुलिस जांच की दिशा, बरामद डायरी की भाषा एक ऐसी तस्वीर बना रहे हैं, जो पिता के शुरुआती दावों से मेल नहीं खाती.घटना के बाद पिता चेतन कुमार ने दावा किया कि उनकी तीनों बेटियां पिछले करीब तीन वर्षों से एक कोरियाई टास्क-आधारित गेम या ऐप के प्रभाव में थीं.उनका कहना था कि इसी वजह से बच्चियों ने स्कूल जाना छोड़ दिया और खुद को पूरी तरह अलग-थलग कर लिया.यह दावा सोशल मीडिया और शुरुआती खबरों में तेजी से फैला.लेकिन अब तक की जांच में पुलिस को ऐसा कोई तकनीकी या डिजिटल साक्ष्य नहीं मिला है, जिससे इस बात की पुष्टि हो सके कि बच्चियां किसी ऐसे ऐप का इस्तेमाल कर रही थीं.ट्रांस-हिंडन के डीसीपी निमिष पाटिल साफ शब्दों में कह चुके हैं कि फिलहाल पुलिस के पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जो इस दावे को मजबूत करे.
डायरी ने बदला पूरा नैरेटिव
पुलिस को तीनों बहनों के कमरे से नौ पन्नों की एक पॉकेट डायरी मिली.यह डायरी न केवल भावनाओं से भरी है, बल्कि कई ऐसे संकेत देती है, जो किसी डिजिटल लत से ज्यादा घरेलू टकराव की ओर इशारा करते हैं.डायरी में कोरियाई संस्कृति के प्रति आकर्षण का जिक्र है, लेकिन कहीं भी किसी खास ऐप, गेम या ऑनलाइन टास्क का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिलता.इसके बजाय, भाषा और भावनाएं यह बताती हैं कि बच्चियां अपनी पसंद को लेकर परिवार से लगातार संघर्ष कर रही थीं.डायरी के कुछ अंश सीधे माता-पिता पर सवाल खड़े करते हैं.इसमें लिखा है कि परिवार उनकी पसंद और भविष्य को स्वीकार नहीं कर रहा था.शादी को लेकर भी असहमति का जिक्र है.डायरी का सबसे गंभीर और संवेदनशील हिस्सा वह है, जहां शारीरिक सजा का जिक्र मिलता है.अंत में पिता के नाम लिखी गई माफी कि आपकी मार से बेहतर हमारे लिए मौत है… सॉरी पापा. इस पूरे मामले को और गहरा बना देती है।

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