
संघ के 100 साल: सरस्वती ताई आप्टे के बिना राष्ट्र सेविका समिति की कहानी अधूरी है
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भारत के कुछ क्षेत्रों में उन दिनों शादी के बाद महिलाओं का नाम बदल दिया जाता था. इसी तरह की कहानी तापी के साथ हुई. उनका नाम तापी से सरस्वती कर दिया गया, वैसे ही जैसे कभी मनु का नाम लक्ष्मीबाई कर दिया गया था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है सरस्वती ताई की कहानी.
संघ की इस 100 कहानियों की सीरीज में हम एक लेख में लिख ही चुके हैं कि RSS की स्थापना के 11 साल के अंदर वो हो गया, जो संघ संस्थापक डॉ. हेडगेवार की योजना में भी तब तक नहीं आया था. दो स्वयंसेवकों की विधवा मां ने शाखा के प्रभाव में अपने बच्चों में सकारात्मक बदलाव देखकर डॉ हेडगेवार से जिद की कि महिलाओं का भी एक ऐसा संगठन होना चाहिए, शुरूआती तौर पर मना करने के बावजूद वो मां नहीं मानीं तो डॉ हेडगेवार ने उन्हें कहा कि आप कार्य संभालो तो हम शुरू कर सकते हैं. वो खुशी खुशी तैयार हो गईं और 1936 में महिला RSS यानी राष्ट्र सेविका समिति की स्थापना हुई और संस्थापिका थीं लक्ष्मीबाई केलकर, जिन्हें प्यार से स्वयंसेविकाएं मौसी कहा करती थीं. आज देश भर में राष्ट्र सेविका समिति की इकाइयां हैं, हजारों कार्यक्रम साल भर में हो रहे हैं, करीब 26 देशों में राष्ट्र सेविका समिति का काम शुरू हो चुका है तो उसके पीछे की प्रेरणा ‘मौसी-ताई’ की इसी जोड़ी को माना जात है. मौसीजी थी लक्ष्मीबाई केलकर तो ताई कहलाती थीं सरस्वती ताई आप्टे. लोकमान्य तिलक की नातिन थीं सरस्वती ताई आप्टे
ताई का जन्म 17 मार्च 1910 को फाल्गुन वद्य एकादशी, शक 1882 को कोंकण के अंजरले गांव में सावित्रीबाई की गोद में हुआ था. उनका जन्म का नाम तापी था - तापी का अर्थ है तपहारिणी, सुखहारिणी. लोकमान्य तिलक की यह पोती देशभक्ति के मूल्यों के साथ जन्मी थीं. परिवार से विरासत में ही देशभक्ति मिली थी. लोकमान्य तिलक उनके पिताजी के मामाजी थे.
1925 में विवाह के बाद वे विनायकराव आप्टे की 'सरस्वती' बनीं. उन दिनों उस क्षेत्र में विवाह के बाद महिला का नाम बदल दिया जाता था, उनका नाम तापी से सरस्वती कर दिया गया, वैसे ही जैसे कभी मनु का नाम लक्ष्मीबाई कर दिया गया था. यूं तापी और सरस्वती दोनों ही नदियों के नाम हैं. हालांकि सरस्वती भी नदियों की तरह गतिशील ही थीं. उन्होंने अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए निरंतर कार्य करके इन दोनों नामों को सार्थक किया। सरस्वती जब तापी थीं, तभी पुणे में संघ की विचारधारा से प्रभावित थीं. पुणे में उन्होंने खुद भी एक महिला संगठन खड़ा कर दिया था और उसमें काफी मेहनत कर रही थीं. डॉ. हेडगेवार के सुझाव पर, उन्होंने बिना किसी स्वार्थ के पुणे के इस संगठन को वर्धा की लक्ष्मी समिति के कार्य के लिए समर्पित कर दिया.
परिवार के दायित्वों को सामंजस्यपूर्वक निभाते हुए, वे बाहरी दुनिया की घटनाओं पर भी पैनी नजर रखती थी और उन पर चिंतन करती थीं. इसी क्रम में पति विनायक राव को 'पुणे संघचालक' का दायित्व सौंपा गया और आप्टे का घर 'संघ कार्यालय' बन गया. संघ का अनुशासन, वैचारिक चिंतन, आचरण, कार्यशैली, देशभक्ति, इन सभी का ताई के मन और विचारों पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने लगा. ताई के स्नेहपूर्ण व्यवहार और 'मातृहस्तें भोजनम' की संस्कृति के कारण उनका घर स्वयंसेवकों का केंद्र बन गया. आप्टे के घर में प्रसाद भोजन से ही देशभक्तों का सृजन होने लगा.
तब ताई को भी लगने लगा कि उनको भी महिलाओं के लिए कुछ करना चाहिए. पति विनायक राव से चर्चा हुई तो उन्होंने कहा कि कठिन काम है, अच्छी तरह सोच समझकर कदम उठाना, बाद में फिर पीछे मत हटना. प्रतिज्ञा लेनी पड़ेगी और उसका अंतिम सांस तक पालन करना पड़ेंगा. उन्हें कहां पता था कि वो अंतिम सांस तक इस कार्य में अपना सब कुछ राष्ट्र सेविका समिति के संगठन में ही लगा देंगी.
जब मिलीं मौसी-ताई पहली बार

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