
संघ के 100 साल: पहली गुरुदक्षिणा की कहानी, आखिर चंदा क्यों नहीं लेता आरएसएस?
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संघ दुनिया का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन है, सब जानते हैं. पर क्या कभी किसी स्वयंसेवक को चंदा मांगते देखा है? नहीं देखा होगा. क्योंकि संघ चंदा लेता ही नहीं. अब अगर चंदा नहीं लेता तो चलता कैसे है? RSS के 100 सालों के सफर 100 कहानियों की कड़ी में आज वो कहानी, जो इस सवाल का जवाब है.
बात उन दिनों की है जब बाला साहब देवरस सरसंघचालक थे. गोपाष्टमी का दिन था और जल्द ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का एक पथसंचलन होना था. पैसों की उन दिनों इतनी कमी थी कि पथसंचलन के लिए वाद्य यंत्रों या बैंड का इंतजाम नहीं हो पा रहा था. तब देवरस के साथ-साथ बाबा साहब आप्टे, दादा राव परमार्थ और कृष्णराव मुहर्रिर चार मील पैदल चलकर एक सज्जन के यहां पहुंचे, जिनकी गुरुदक्षिणा नहीं आ पाई थी. आने-जाने और आवभगत में तीन घंटे लग गए, तब जाकर उस गुरुदक्षिणा से एक बिगुल खरीदा जा सका. ये किस्सा के आर मलकानी में अपनी किताब ‘द आरएसएस स्टोरी’ में लिखा है.
संघ को 'मनी' नहीं, 'मैन चाहिए ऐसा नहीं था कि संघ के लिए तब कोई दान देने वाला नहीं था. मदन मोहन मालवीय को उन दिनों ‘मनी मेकिंग मशीन’ कहा जाता था. एक बार वे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से मिलने नागपुर आए. मोहिते वाडा की हालत देखकर उन्होंने कहा भी कि क्या संघ के लिए धन जुटाने में कुछ सहायता की जाए? लेकिन डॉ हेडगेवार ने ये कहकर मना कर दिया कि हमें मनी नहीं मैन चाहिए, यानी स्वयंसेवक. दरअसल संघ ने शुरूआती दिनों से ही ये नियम बना लिया है कि संघ किसी से दान या चंदा नहीं लेगा, बल्कि उसके खुद के स्वयंसेवक ही अपने मन से जो भी श्रद्धा होगी, गुप्त रूप से हर साल गुरुदक्षिणा के दौर पर देंगे. इसके पीछे डॉ. हेडगेवार की एक सोच थी कि संघ किसी व्यक्ति पर निर्भर ना रहे, वैयक्तिक सोच का शिकार ना हो, बल्कि हजारों साल से इस देश की जो सनातनी परम्पराएं चली आ रही हैं, उसी के आधार पर आगे बढ़े. लेकिन कोई भी संगठन धन के बिना तो चल नहीं सकता, और चंदा मांगने जाओ तो लोग बिना जाने बूझे उन पर आरोप भी लगाते हैं कि धन का सही उपयोग किया भी कि व्यक्तिगत लाभ में लगा दिया?! ऐसे में तमाम तरह की चर्चाएं संघ में हुईं कि कैसे धन इकट्ठा करने की कोई ऐसी प्रक्रिया अपनाई जाए, जो सैकड़ों साल बाद भी पारदर्शी हो, उस पर उंगलियां ना उठ सकें, और किसी व्यक्ति या परिवार विशेष का उस पर नियंत्रण ना हो. 1925 में स्थापना होने के 3 साल बीत गए थे, धन की आवश्यकता पड़ने पर कुछ लोगों से आर्थिक सहायता ली जा रही थी. लेकिन अब नई व्यवस्था लानी थी, कुछ साथियों ने सुझाव दिया कि लॉटरी सिस्टम से धन इकट्ठा किया जाए, तो किसी ने कहा धन इकट्ठा करने के लिए ड्रामा टिकट्स बेची जानी चाहिए. ऐसे में एक विचार उठा कि क्यों ना जो इसके स्वयंसेवक हैं, वही धन दें और बाहर से धन लिया ही ना जाए. ये धन गुप्त तरीके से लिफाफे में लिया जाए ताकि गरीब, अमीर सब बराबर रहें.
यहां पढ़ें: RSS के सौ साल से जुड़ी इस विशेष सीरीज की हर कहानी
डॉक्टर हेडगेवार ने ऐसे शुरू की थी गुरु-दक्षिणा की परंपरा नाना पालकर, डॉ हेडगेवार की जीवनी में इसका श्रेय डॉक्टरजी को ही देते हैं. वो लिखते हैं कि 1928 में गुरु पूर्णिमा के दिन डॉ. हेडगेवार ने नागपुर के सभी स्वयंसेवकों से गुरु पूर्णिमा के दिन, शाखा में गुरु पूर्णिमा उत्सव के लिए कुछ फूल और श्रद्धानुसार गुरुदक्षिणा लिफाफे में लाने के लिए कहा. स्वयंसेवक इस बात से हैरान थे कि गुरुदक्षिणा अर्पित किसको करेंगे, फूल किसको चढ़ाएंगे? मन में था कि या तो डॉ हेडगेवार खुद होंगे या अन्ना सोहानी (प्रशिक्षण प्रमुख)? लेकिन जब सभी लोग शाखा में जमा हुए, तब उनको भगवा ध्वज पर फूल चढ़ाने व गुरुदक्षिणा अर्पित करने को कहा गया. स्वयंसेवकों के लिए ये नया अनुभव था, हालांकि शाखा की रोज की गतिविधि भगवा ध्वज को प्रणाम करके ही शुरू होती थी. नाना पालेकर लिखते हैं, किसी भी व्यक्ति को डॉ. हेडगवार गुरु का दर्जा नहीं देना चाहते थे. इस कार्यक्रम में डॉ. हेडगवार ने कहा, “भगवा ध्वज हजारों सालों से इस संस्कृति के लिए प्रेरणा स्रोत रहा है, कोई भी व्यक्ति कितना भी महान क्यों ना हो, उसमें कुछ खामियां होती ही हैं. इसलिए किसी व्यक्ति की जगह भगवा ध्वज ही हमारा गुरु होगा”. ये उनकी दूरदर्शिता ही थी कि तमाम संगठनों के पैसों पर उनके अंदर से ही सवाल उठते रहे हैं लेकिन संघ पर ऐसी कोई छाया नहीं आई. ये पहला गुरूदक्षिणा उत्सव था और इसमें कुल 84 रुपये 50 पैसे की गुरुदक्षिणा आई. आज की कीमतों के हिसाब से ये 10 से 15 हजार रुपयों के बीच होगी. कुछ स्वयंसेवकों ने तो आधे पैसे तक गुरुदक्षिणा दी थी. अभी भी संघ गुरुदक्षिणा के बजट से ही चलता है. सैकड़ों प्रचारकों और कार्यालयों का खर्च उसके स्वयंसेवकों के ही धन से चलता है. कभी आपको संघ का स्वयंसेवक, अपने संगठन के लिए चंदा मांगता नजर नहीं आएगा और ऐसे-ऐसे लोग गुरुदक्षिणा देते आए हैं, जिनके नाम चौंकाते हैं. गुरुदक्षिणा देने वालों की संख्या का अंदाजा आप इंडियन एक्सप्रेस की इसी खबर से लगा सकते हैं कि 2017 में केवल दिल्ली के ही 95 हजार लोगों ने गुरुदक्षिणा दी थी.
पिछली कहानी: अगर डॉ हेडगेवार पर वो रिवॉल्वर मिल जाती तो संघ नागपुर में ही खत्म हो जाता

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