
संघ के 100 साल: उस दिन कार रुक जाती, तो गुरु गोलवलकर की हत्या का पूरा प्लान था!
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प्रतिबंध हटने के बाद संघ और मजबूत होकर निकला. नेहरू और गुरु गोलवलकर की मुलाकात हो रही थी. पटेल उन्हें मिलने बुला रहे थे. इस घटनाक्रम से जो लोग आरएसएस के खत्म हो जाने का स्वपन देख रहे थे. उन्हें काफी ठेस पहुंचा. इसी माहौल में कुछ असामाजिक तत्वों ने सांगली के आस-पास गोलवलकर की हत्या की योजना बनाई. लेकिन नियति को तो कुछ और मंजूर था. RSS के 100 सालों के सफर की 100 कहानियों की कड़ी में आज पेश है उसी घटना का वर्णन.
महीनों तक शाखाएं नहीं लगीं, कोई वर्ग नहीं लगा, बैठकें भी हुईं तो गुप्त रूप से और वो भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर लगे प्रतिबंध या गुरु गोलवलकर को जेल से छुड़ाने के लिए रणनीति बनाने पर केन्द्रित रहीं. सत्याग्रह की योजना बनाई जाती रही. बाहर आने के बाद गुरु गोलवलकर को संघ का रुका हुआ काम फिर से शुरू करना था. सबको एक बार फिर से उत्साह से भरना था. पूरे देश के स्वयंसेवक उनसे मिलने को उतावले थे, सो गुरु गोलवलकर ने इसके लिए पूरे भारत की यात्रा की योजना बनाई. माना जाता है कि गुरु गोलवलकर अपने जीवन में पूरे देश की 66 बार यात्राएं कर चुके थे. लेकिन ये शायद पहली यात्रा थी, जब उन्हें मराठी इलाकों में ही मारने की साजिश रची जा रही थी.
संगठन में उनके ना रहने से जो कार्य शिथिल पड़ गए थे, या विलंबित थे, उन सबको फौरी तौर पर करने के बाद गुरु गोलवलकर ने 20 अगस्त 1949 में दिल्ली से अपनी यात्रा की शुरूआत की योजना बनाई, लेकिन सरदार पटेल बीमार थे, सो वो उनसे मिलने बम्बई (अब मुंबई) चले गए. 1 घंटे की बातचीत में सीपी भिषिकर लिखित गुरु गोलवलकर की आत्मकथा के अनुसार, सरदार पटेल ने उनसे ईसाई मिशनरियों की बढ़ती हुई गतिविधियों की चर्चा की. पटेल ने उनसे नए-नए बने देश पाकिस्तान को लेकर भी चिंता जताई कि इसके बनने से अब ढेर सारी परेशानियां पैदा होंगी.
दिल्ली में प्रतिबंध हटने के बाद जुटे 5 लाख लोग
गुरु गोलवलकर फिर से दिल्ली में थे. उनके स्वागत को देखकर लग रहा था प्रतिबंध के बाद RSS और मजबूत होकर उभरा है, क्योंकि जनता के बीच ये संदेश गया है कि उनको गांधीजी की हत्या में जानबूझकर फंसाया गया था, बेवजह प्रतिबंध लगाया गया और इतने दिन जेल में रखा गया. हजारों लोग सड़कों पर थे और बस उनकी एक झलक पाना चाहते थे. दावा किया जाता है कि रामलीला मैदान में उनकी सभा में पांच लाख लोग थे. उनकी सभा में भीड़ को देखकर बीबीसी ने अपनी रिपोर्ट में लिखा था, “Shri Guruji is a shining star that has arisen on the Indian firmament. The only other Indian who can draw such huge crowds is Pt. Nehru.” हर शहर में उनका ऐसे ही स्वागत हो रहा था. हर जगह लोगों को लगता था कि उनके मन के आक्रोश को गुरु गोलवलकर का सरकार के खिलाफ कोई ऐलान ही ठंडा कर सकता है. उनको उम्मीद थी कि वो कुछ तो ऐसा कहेंगे कि सरकार की नींद उड़ जाएगी, लेकिन जेल में फिर से अपने आध्यात्म जीवन की ओर लौट जाने वाले गुरु गोलवलकर शांत मन से उनकी भावनाओं को समझते हुए, कुछ ऐसे समझाते थे कि, “कभी हमारी जीभ अपने ही दांतों के नीचे आ जाती है, काफी दर्द होता है, तो क्या हम दांतों से उसका बदला लेते हैं? लेंगे तब भी दर्द हमें ही होगा. जिन लोगों ने हमारे साथ गलत किया, वो भी तो हमारे लोग हैं. उन्हें माफ कर दीजिए और फिर से उसी राष्ट्र निर्माण के कार्य में जुट जाइए, जो अधूरा छूट गया था”.
प्रतिबंध हटने के बाद अगस्त से लेकर नवम्बर 1949 तक पंडित नेहरू से गुरु गोलवलकर 3 बार मिले. सबसे पहले 23 अगस्त की सभा के एक हफ्ते बाद ही यानी 30 अगस्त को. तीनों बैठकों में हिंदू सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, धार्मिक सहिष्णुता, गैर हिंदुओं का मुख्य धारा में आना, संघ के कार्य और संगठन, अहिंसा की नीति जैसे कई मुद्दों पर व्यापक चर्चा हुई. लेकिन खुद गुरु गोलवलकर को लगता था कि पंडित नेहरू ने एक खास सोच संघ को लेकर बना रखी थी, वो अपने मन में उसे बदलने को तैयार नहीं दिखते थे. उन्हें नहीं लगता था कि संघ के बारे में नेहरू कभी अच्छा सोच पाएंगे.
हालांकि एस.आर. गोयल की किताब History in the Making: Nehru and the Nehru Era में नेहरूजी का सरदार पटेल के नाम एक पत्र का उल्लेख है, तब नेहरू इंग्लैंड यात्रा पर थे. इसमें उन्होंने लिखा था कि यहां भारत में ब्रिटिश सांसद कम्युनिस्टों पर भारत में कार्रवाई को लेकर सवाल उठा रहे हैं. खुद लेडी एडविना भी चिंतित थीं. संघ के लोग तो जेल से छोड़े जा रहे हैं और कम्युनिस्टों को जेल भेजा जा रहा है. नेहरू का समाजवाद, मार्क्सवाद के साथ झुकाव सबको पता था, उसमें बहुत कम लोगों को पता है कि एडविना खुद कम्युनिस्ट थीं.

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