
'वन टिकट वन फैमिली' वाले फॉर्मूले के साथ ही कांग्रेस ने परिवारवाद की बात स्वीकार कर ली?
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कांग्रेस पार्टी वन टिकट वन फैमिली के फॉर्मूले पर चलने की कोशिश करने वाली है. उदयपुर में हुए चिंतन शिविर में भी इस पर चर्चा हुई है. लेकिन कांग्रेस के लिए इसे लागू करना आसान नहीं रहने वाला है.
उदयपुर में हुए कांग्रेस चिंतन शिविर में परिवारवाद पर गहन मंथन हुआ है. खबर है कि जल्द ही पार्टी वन टिकट वन फैमिली का फॉर्मूला निकाल सकती है. अगर ऐसा होता है तो एक परिवार से सिर्फ एक टिकट मिलने का मौका रहने वाला है. लेकिन क्या सही मायनों में कांग्रेस पार्टी इस फॉर्मूले पर अमल कर पाएगी? क्या अपने ऊपर लगे परिवारवाद के आरोप को कांग्रेस धो पाएगी?
अब कांग्रेस पर परिवारवाद को लेकर सबसे ज्यादा बीजेपी हमलावर रही है. वहां भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कई मौकों पर इसे एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है. कई इंटरव्यू में भी मोदी द्वारा कांग्रेस के परिवारवाद का जिक्र किया गया है. उत्तर प्रदेश चुनाव के दौरान ANI को दिए एक इंटरव्यू में पीएम मोदी ने बीजेपी और कांग्रेस के बीच के परिवारवाद का अंतर बताया था.
उन्होंने कहा था कि एक ही परिवार के एक या दो सदस्यों का चुनाव जीतना और एक ही पार्टी के लोगों को पार्टी का महत्वपूर्ण पद मिलना अलग बात है. जब भी किसी पार्टी में बड़े पद एक ही परिवार के लिए फिक्स हो जाते हैं, तब सबसे ज्यादा नुकसान टैलेंट का होता है. पीएम मोदी ने इस बात पर भी जोर दिया था कि जब भी किसी पार्टी में परिवारवाद जरूरत से ज्यादा हो जाता है, वहां पर परिवार ही सुप्रीम बन जाता है, पार्टी बचे ना बचे, देश बच पाए या ना बच पाए, सबकुछ एक ही परिवार के इर्द-गिर्द केंद्रित हो जाता है.
अब पीएम मोदी ने तो सिर्फ परिवारवाद को लेकर कांग्रेस पर एक आरोप लगाया था, लेकिन देश की सबसे बड़ी पार्टी ने उस मुद्दे पर मंथन कर, वन टिकट वन फैमिली का फॉर्मूला निकाल ये साफ कर दिया कि उन्हें भी इस बात का एहसास है कि पार्टी में परिवारवाद की जड़े काफी मजबूत हैं. उनका ये कबूलनामा ही कहीं ना कहीं उन्हें एक बार फिर बीजेपी के निशाने पर लाने वाला है.
वैसे कांग्रेस ने ये नया फॉर्मूला निकाला जरूर है लेकिन जमीन पर इसे अमलीजामा पहनाना उतना ही मुश्किल है. इसका एक बड़ा कारण ये है कि कांग्रेस के अंदर गांधी परिवार की सक्रियता बहुत ज्यादा है. कांग्रेस का संविधान बताता है कि जो भी अध्यक्ष का पद संभालता है, उसे पूरे पांच साल का कार्यकाल पूरा करना होता है. ऐसे में अब अगर 2022 में गांधी परिवार को छोड़ किसी दूसरे शख्स को पार्टी अध्यक्ष बनाती है तो 2027 तक उसका कार्यकाल होगा. ये अपने आप में एक बड़ा एक्सपेरिमेंट या दांव रहेगा.
देश की राजनीति एक और ट्रेंड की ओर ध्यान आकर्षित करती है. इस देश में परिवारवाद तब तक कोई बड़ा मुद्दा नहीं है जब तक वो पार्टी चुनाव जीत रही हो, वो नेता चुनाव जिताने में सक्षम रहे. इसी वजह से जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी पर कभी भी परिवारवाद को लेकर ज्यादा आरोप नहीं लगे. दूसरी पार्टियों में एमके स्टालिन, जगन मोहन रेड्डी, नवनीन पटनायक, ममता बनर्जी जैसे नेता भी परिवारवाद से जोड़े जाते हैं, लेकिन क्योंकि उनका चुनाव में सक्सेस रेट बेहतरीन है, ऐसे में कोई ज्यादा सवाल नहीं कर पाता.

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