
लंबे क्रिमिनल रिकॉर्ड के बाद भी क्यों रिहा था शिवांक अवस्थी की हत्या का आरोपी? जानें कैसा है कनाडा का पैरोल सिस्टम
AajTak
टोरंटो में यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के पास 20 वर्षीय भारतीय छात्र शिवांक अवस्थी की हत्या ने कनाडा के पैरोल सिस्टम पर सवाल उठा दिए हैं. आरोपी 28 वर्षीय बाबाटुंडे अफुवापे का लंबा और हिंसक अपराधी रिकॉर्ड था, फिर भी उसे पैरोल मिली थी.
23 दिसंबर 2025 को कनाडा में यूनिवर्सिटी ऑफ टोरंटो के स्कारबोरो परिसर के पास 20 वर्षीय भारतीय डॉक्टोरल छात्र शिवांक अवस्थी को बेरहमी से गोली मार दी गई. उसकी हत्या ने कनाडा के पैरोल सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं. पुलिस ने मामले की जांच के बाद 28 दिसंबर को 28 वर्षीय नाइजीरियन मूल के कनाडाई नागरिक बाबाटुंडे अफुवापे को गिरफ्तार किया और उस पर पहली डिग्री हत्या (first‑degree murder) का आरोप लगाया.
हालांकि पुलिस का कहना है कि शिवांक को अफुवापे पहले से नहीं जानता था लेकिन इस घटना के बाद सवाल उभरे हैं कि क्या अफुवापे जैसे अपराधी को पैरोल देना ही इस दर्दनाक हत्या का कारण है?
क्या है कनाडा का पैरोल सिस्टम?
कनाडा का पैरोल सिस्टम Corrections and Conditional Release Act (CCRA) के तहत काम करता है और मुख्य रूप से Parole Board of Canada (PBC) द्वारा लागू होता है. यह बोर्ड स्वतंत्र रूप से फैसले करता है कि किसी कैदी को समाज में निगरानी के साथ रिहा किया जाए या नहीं.
पैरोल का मकसद समुदाय की सुरक्षा के साथ अपराधी को सुधार का मौका देना है. इस प्रणाली में कई तरह की रिहाई शामिल है:
पैरोल पर रहते हुए अपराधियों की निगरानी Correctional Service of Canada (CSC) अधिकारी करते हैं, और अगर वे नियम तोड़ते हैं तो उन्हें वापस जेल भेजा जा सकता है.

ईरान के लिए आज की रात भारी हो सकती है. निर्वासित राजकुमार रजा पहलवी ने राष्ट्रपति ट्रंप से तत्काल मदद की मांग की है उन्होंने कहा है कि ईरान में ब्लैकआउट है और इस ब्लैकआउट का इस्तेमाल अली खामेनेई की सरकार युवा क्रांतिकारियों को मारने के लिए कर रही है. उन्होंने कहा है कि कुछ ही देर में लोग सड़कों पर होंगे.

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने हाल ही में बढ़ रहे आंदोलन के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर पहली बार सीधे हमले किए हैं. देश के नाम अपने संबोधन में खामेनेई ने कहा कि ट्रंप का भी अंत होगा. उन्होंने यह भी कहा कि कुछ ईरानी जनता दूसरे देश के नेताओं को खुश करने के लिए सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं. इधर, ईरानी जनता और सरकार के बीच जारी गतिरोध के कारण देश में आंदोलन तेज हुए हैं, जो राजनीतिक बदलाव की ओर संकेत कर सकते हैं.

ईरान को इस्लामी रिपब्लिक और कट्टरपंथ रास नहीं आया. आर्थिक तबाही, महिलाओं का दमन, भ्रष्टाचार आदि ने लोगों को सड़कों पर उतरने को मजबूर कर दिया है. ईरानी लोग सड़कों पर उतरकर 'तानाशाह मुर्दाबाद... इस्लामिक रिपब्लिक मुर्दाबाद... ना गाजा ना लेबनान के लिए, मेरी जिंदगी ईरान के लिए...' जैसे नारे लगा रहे हैं.

अटलांटिक महासागर में आइसलैंड के समीप रूसी नौसेना की एक पनडुब्बी और कई युद्धपोतों ने एक महत्वपूर्ण जब्ती की है. इस घटना में रूस ने इसे खुले समंदर में हुई एक स्पष्ट डकैती बताया है. इस कार्रवाई के चलते क्षेत्र में राजनीतिक और सामरिक तनाव की स्थिति बनी हुई है. इस मामले की गंभीरता को देखते हुए विभिन्न अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां भी स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं. ऐसे समय में जब वैश्विक राजनीति बेहद संवेदनशील है, यह घटना विदेशी समुद्री सुरक्षा और रणनीतिक गतिशीलता पर भी असर डाल सकती है.

ईरान में इंटरनेट लगभग पूरी तरह बंद कर दिया गया है. सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई की अगुवाई वाली इस्लामिक सरकार को हटाने की मांग करते हुए प्रदर्शन कई शहरों में फैल गए. तेहरान के पश्चिम में कराज के पास गाड़ियों में आग लगा दी गई. बाद में ईरानी मीडिया में ऐसे वीडियो सामने आए, जिनमें गोलियों की आवाज़ के बाद प्रदर्शनकारी भागते हुए दिखे.








