
रूस, चीन और खाड़ी- कौन-कौन दे चुका तालिबान को मान्यता, क्यों ज्यादातर मुल्क अब भी इसे आतंकी संगठन मानते हैं?
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अफगानिस्तान में तालिबानी सत्ता को आए पूरे तीन साल हो चुके. इस बीच देश की आर्थिक-सामाजिक हालत तो खराब है ही, साथ ही लगभग सभी ने काबुल से अपना डिप्लोमेटिक रिश्ता खत्म कर दिया, सिवाय इक्का-दुक्का देशों के. जानें, क्या होता है अगर किसी देश की सरकार को इंटरनेशनल स्तर पर मान्यता न मिले.
काबुल पर तालिबान का राज आने के बाद से वहां की स्थिति खराब होती जा रही है. फिलहाल 90% से ज्यादा अफगानी गरीबी से जूझ रहे हैं. इस्लामिक कानून के चलते महिलाएं घरों पर रहने को मजबूर हैं. तालिबान सरकार खुद कम परेशानी में नहीं. चरमपंथ की वजह से उसे कोई भी देश काबुल की आधिकारिक सरकार मानने को राजी नहीं. लेकिन क्या इससे कोई फर्क पड़ता है!
क्या है तालिबान पश्तो में स्टूडेंट्स को तालिबान कहते हैं. नब्बे के दशक में जब रूस अफगानिस्तान से अपने सैनिकों को लौटा रहा था, तब ये संगठन आकार लेने लगा. इसकी शुरुआत धार्मिक संस्थानों में हुई. इसके तहत कट्टर मान्यताओं का प्रचार होने लगा. जल्द ही इसका असर बढ़ा और साल 1996 में इस संगठन ने अफगानिस्तान की राजधानी काबुल पर कब्जा कर लिया. यहां से देश पर चमरपंथी ताकतें राज करने लगीं. वे महिलाओं को बुरके में रहने और पुरुषों के बगैर घर से न निकलने को कहतीं. इस्लामिक कानून इतनी कट्टरता से लागू हुए कि संगीत पर भी बैन लग गया.
तालिबान 1.0 को इन्होंने था अपनाया
कट्टरता के इसी दौर में तालिबान को देशों ने आतंकी संगठन का दर्जा देना शुरू कर दिया क्योंकि वे दूसरे देशों की सीमाओं तक भी अपनी कट्टरता पहुंचा रहे थे. अफगानिस्तान पर तालिबानी राज के दौर में केवल तीन देशों ने उसे मान्यता दी थी- सऊदी अरब, यूएई और पाकिस्तान. ये तीनों ही मुस्लिम बहुल देश हैं.
अक्टूबर, 2001 से लेकर दिसंबर के बीच अमेरिकी सेनाओं ने तालिबान को लगभग खत्म कर दिया था, लेकिन भीतर ही भीतर चिंगारी फैलती रही. नतीजा ये हुआ कि ठीक बीस साल बाद इस टैरर गुट ने एक बार फिर काबुल में वापसी की. इस बार उसने चुनी हुई सरकार को गिरा दिया. इस महीने तालिबानी राज को तीन साल हो चुके लेकिन देश इस संगठन को राजनैतिक मान्यता देने को राजी नहीं.

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