
'ये आकाशवाणी है...' जो शब्द थे अहसास, जिन्हें कभी नहीं भुलाया जा सकता!
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“ये आकाशवाणी है…” एक ऐसी आवाज, जो आज भी यादों में गूंजती है. यह सिर्फ एक प्रसारण नहीं था, वो पूरे भारत की आवाज थी, जिसे पूरा भारत साथ सुनता था.
'ये आकाशवाणी है'
एक सजी-संवरी साइड टेबल पर रखे लकड़ी वाले रेडियो सेट से आवाज आती है.
एक दादाजी अपनी आर्मचेयर पर बैठे हैं. चश्मा नाक के नीचे टिका हुआ, हाथ छड़ी पर टिके हुए. रात के 8 बजे हैं. ये नजारा हमेशा 8 बजे ही होता है. समाचार बुलेटिन शुरू होता है, और खाना, मेहमान, बिजली कोई भी इसको बीच में नहीं रोक सकता.
वैसे कई सालों तक, ये ही भारत का प्राइम टाइम था.
टीवी डिबेट, पुश नोटिफिकेशन और तड़कती-भड़कती हेडलाइन्स से बहुत पहले, देश कुछ समय पर ऑल इंडिया रेडियो जरूर सुनता था. दिल्ली में रेडियों में बोले गए ये शब्द अलग-अलग शहरों से होते हुए रेगिस्तान, जंगल और समुद्री किनारों तक पहुंचते थे. ये आवाज युद्ध की खबरें, चुनाव नतीजे, मानसून का अनुमान और बजट भाषण उन घरों तक ले जाती थी जिनके पास दुनिया देखने की कोई और खिड़की नहीं थी.
रेडियो बैकग्राउंड शोर नहीं था. वह तय समय पर सुना जाने वाला रिश्ता था. वह अनुशासन था. वह हमारे और आपको पूर्वजों का भरोसा था.

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