
युमनाम खेमचंद एंड टीम कैसे मणिपुर को पुराने दौर में वापस ले जा पाएगी?
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मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के नेतृत्व में मणिपुर में नई सरकार बन गई है. सत्ता की कमान जरूर मैतेई समाज से आने वाले खेमचंद को मिली हो, लेकिन बीजेपी ने डिप्टीसीएम के रूप में एक कुकी और नागा समुदाय से बनाकर सियासी दांव चला है. ऐसे में खेमचंद एंड टीएम क्या मणिपुर को पुराने दौर में वापस लौटा पाएगी?
मणिपुर में एक साल बाद राष्ट्रपति शासन समाप्त कर दिया गया है और नई सरकार का गठन हो गया है. राज्यपाल अजय कुमार भल्ला ने इंफाल के लोकभवनमें बुधवार को युमनम खेमचंद सिंह को राज्य के मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलाई. मुख्यमंत्री के साथ दो डिप्टी सीएम और दो अन्य विधायकों ने मंत्री पद की शपथ ली.
बीजेपी ने खेमचंद सिंह को सत्ता की कमान सौंपी तो नेमचा किप्गेन और लोसी दिक्हो को उपमुख्यमंत्री बनाकर सियासी बैलेंस बनाने की कवायद की है. इसके अलावा बीजेपी के गोविंदास कोंथौजम और नेशनल पीपुल्स पार्टी के लोकेन मंत्री बनाए गए हैं.
मणिपुर में खेमचंद के नेतृत्व में नई सरकार का गठन हो गया है, लेकिन सात मंत्री पद की जगह अभी खाली है. माना जा रहा है कि मंत्रिमंडल विस्तार बाद में होगा, लेकिन अब असल इम्तिहान युमनाथ खेमचंद सिंह का होना है.
खेमचंद के सामने सियासी मुश्किलें? मुख्यमंत्री युमनाम खेमचंद सिंह के सत्ता की कमान मिलने के साथ-साथ कांटों भरा ताज मिला है. राज्य में अभी भी सामाजिक विभाजन बना हुआ है. विस्थापित लोग अभी तक राहत शिविरों में ही रह रहे हैं. पहाड़ी और घाटी इलाकों में आवाजाही सीमित है. लोगों के हथियार जमा नहीं हुए हैं. मैतेई और कुकी समुदायों के बीच अविश्वास पहले की तरह ही बना हुआ है.
मणिपुर में अगले साल 2027 में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में एक साल के अंदर ही लोगों के भरोसा जीतने की चुनौती होगी. हालांकि, राज्य में अब चुनी हुई सरकार बहाल होने से लोगों में उम्मीद जगी है कि जल्द ही शांति और सामान्य स्थिति लौटेगी. नए मुख्यमंत्री ने शांति, विकास और सभी समुदायों के हितों को प्राथमिकता देने का वादा किया है, लेकिन क्या नई सरकार इसमें सफल हो पाएगी, क्योंकि पुनर्वास, रास्ते खोलना, संवाद और सुरक्षा का सवाल बना हुआ है.
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