
'मैं रोया हूं खून के आंसू...', नेशनल कॉन्फ्रेंस कार्यकर्ताओं को संबोधित कर बोले फारूक अब्दुल्ला
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फारूक अब्दुल्ला ने बुधवार को एक कार्यक्रम बोलते हुए 90 के दशक में पनपे आतंकवाद पर बोलते हुए कहा कि सारी लड़ाई जमातों की थी. हमारे ऊपर भी आफत आई थी, शाम चार बजे दुकानें बंद हो जाती थीं. उस वक्त वो बेगुनाहों को मारते थे और फिर इस्लाम की बात करते थे.
जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और नेशनल कॉन्फ्रेंस के वरिष्ठ नेता फारूक अब्दुल्ला ने बुधवार को एक कार्यक्रम बोलते हुए 90 के दशक में पनपे आतंकवाद पर प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा कि सारी लड़ाई जमातों की थी. हमारे ऊपर भी आफत आई थी, शाम चार बजे दुकानें बंद हो जाती थीं. उस वक्त वो बेगुनाहों को मारते थे और फिर इस्लाम की बात करते थे.
फारूक अब्दुल्ला ने एक कार्यक्रम में बोलते हुए कहा कि मैं तो सोचा था, मैं यहां आऊंगा और आज आराम करूंगा फिर कल जलसा होगा, अगर वो एक-दो बजे तक भी चले तो कोई परेशानी नहीं होगी. पर मुझे यहां आकर पता चला कि आप लोगों ने जलसा आज ही रखा है तो ठीक है भाई. मगर अफसोस इस बात का है कि इतनी चीजें होती हैं कि हम वक्त को नहीं हरा सकते, क्योंकि वक्त अपने हिसाब से चीजें करता है.
'मैं बयां नहीं कर सकता स्थिति'
उन्होंने कहा कि आपने अपने विचार रखे, मैं खुद मुजरिम हूं. मैं जब 1996 में यहां आया तो मेरी लड़ाई नेशनल कॉन्फ्रेंस की लड़ाई नहीं थी. वो लड़ाई सारी जमातों की थी, क्योंकि वो हम पर ऐसी आफत आई थी कि मैं बयां नहीं कर सकता. चार बजे आप दुकानें बंद कर देते थे. दुल्हा सुबह जाता था और दोपहर एक बजे तक घर ले आता था. ये भी नहीं बता होता था कि जिंदा आएगा या मुर्दा घर आएगा. मैंने खुद देखा है. एक दूल्हे को इन दरिंदों ने कत्ल कर दिया. मैं जब वहां पहुंचा तो मुझे वो मंजर देखकर रोना आ गया था. ये लोग हम जीने भी नहीं देते हैं और फिर इस्लाम-इस्लाम की बातें करते हैं. कहा लिखा है इस्लाम में कि बेगुनाह को मार दो.
मैं उन 6 सालों में खून के आंसू रोया हूं: फारूक अब्दुल्ला
उन्होंने यह भी कहा कि वो समझते थे कि हिंदुओं को कश्मीर से निकालो तो कश्मीर उनका हो जाएगा. उनको जमीन की चाहत थी, उनको इंसानों की चाहत नहीं थी. मस्जिद से लोग निकल रहे हैं उनको गोली मार दी. मैं उन 6 सालों में खून के आंसू रोया हूं. मैं कहता था ये कब बदलेगा. बेरोजगारी आसमान पर थी. हमारे डॉक्टर-इंजीनियर, पढ़े-लिखे बच्चे बेरोजगार थे. इन लोगों ने हमारे साथ क्या नहीं किया. कोई नहीं निकाला उस वक्त हम निकले. हम कितनी मुश्किलों से गुजरे हैं, ये बात हमारे आज के बच्चों को पता नहीं है. हमें यकीन नहीं था कि हम जिंदा रहेंगे या नहीं... लेकिन हम पीछे नहीं हटे. लोगों हमें पाकिस्तानी, खालिस्तानी और अमेरिका का एजेंट भी कहते थे.

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