
बांदा POCSO कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला, 33 बच्चों से दरिंदगी करने वाले इंजीनियर को पत्नी समेत फांसी की सजा
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बांदा की POCSO कोर्ट ने 33 नाबालिग बच्चों से यौन शोषण और डार्क वेब पर अश्लील वीडियो बेचने के मामले में रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को फांसी की सजा सुनाई है. स्पेशल कोर्ट ने हर पीड़ित को 10-10 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश भी दिया है. पढ़ें इस मामले की सिलसिलेवार कहानी.
उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की एक विशेष अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है. कोर्ट ने शुक्रवार को 33 नाबालिग बच्चों के साथ हैवानियत करने और उनके अश्लील वीडियो डार्क वेब पर बेचने वाले दंपति को फांसी की सजा सुनाई है. अदालत ने इस मामले को “रेयरेस्ट ऑफ रेयर” करार दिया. इस केस की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो ने की थी. छह साल पुराने इस मामले में अब जाकर पीड़ितों को न्याय मिला है. कोर्ट ने दोषियों की करतूत को समाज के लिए बेहद खतरनाक बताया.
अदालत का ऐतिहासिक फैसला CBI की जांच के आधार पर बांदा की विशेष POCSO अदालत ने ये सख्त फैसला सुनाया. 20 फरवरी को विशेष न्यायाधीश, POCSO केस, बांदा ने आरोपी रामभवन और उसकी पत्नी दुर्गावती को मौत की सजा सुनाई. दोनों को भारतीय दंड संहिता और POCSO एक्ट की कई धाराओं में दोषी पाया गया. इनमें अप्राकृतिक यौन अपराध, गंभीर यौन शोषण, बच्चों का पोर्नोग्राफी में इस्तेमाल और आपराधिक साजिश जैसी धाराएं शामिल हैं. अदालत ने साफ कहा कि यह अपराध अत्यंत जघन्य और योजनाबद्ध था. इसलिए कठोरतम सजा ही न्याय के अनुरूप है.
कौन हैं दोषी रामभवन और दुर्गावती? मुख्य आरोपी रामभवन सिंचाई विभाग में जूनियर इंजीनियर के पद पर तैनात था. वह चित्रकूट में रहता था और अपने आसपास के बच्चों को निशाना बनाता था. उसकी पत्नी दुर्गावती भी इस पूरे अपराध में बराबर की भागीदार पाई गई. दोनों ने मिलकर बच्चों का यौन शोषण किया और वीडियो रिकॉर्ड किए. जांच में सामने आया कि यह सिलसिला कई वर्षों तक चलता रहा. आरोपी बाहर से सामान्य जिंदगी जीते दिखते थे, लेकिन अंदर ही अंदर एक भयावह अपराध कर रहे थे. अदालत ने कहा कि दोनों ने विश्वास का घोर दुरुपयोग किया.
33 मासूम, कुछ की उम्र सिर्फ तीन सालसीबीआई जांच में खुलासा हुआ कि करीब 33 नाबालिग लड़कों को शिकार बनाया गया. कुछ बच्चों की उम्र मात्र तीन साल थी. आरोपियों ने उनके साथ गंभीर पैठ यौन शोषण किया. कई बच्चों को निजी अंगों में चोटें आईं. कुछ बच्चों को अस्पताल में भर्ती तक कराना पड़ा. कुछ पीड़ितों की आंखों में तिरछापन (स्क्विंट) की समस्या विकसित हो गई. आज भी कई बच्चे मानसिक आघात से जूझ रहे हैं. कोर्ट ने इसे मानवता के खिलाफ अपराध बताया है.
दस साल तक चलता रहा गंदा खेल जांच में सामने आया कि 2010 से 2020 के बीच आरोपी बांदा और चित्रकूट इलाके में सक्रिय रहे. वे पड़ोस और रिश्तेदारों के बच्चों को भी नहीं बख्शते थे. बच्चों को बहलाने-फुसलाने के लिए पैसे और गिफ्ट दिए जाते थे. ऑनलाइन वीडियो गेम का लालच देकर उन्हें घर बुलाया जाता था. इसके बाद उनके साथ यौन शोषण कर वीडियो बनाए जाते थे. यह सब एक सुनियोजित तरीके से किया जाता था. दस साल तक यह सिलसिला चलता रहा. किसी को भनक नहीं लगी.
डार्क वेब पर बेचते थे अश्लील वीडियो जांच एजेंसी के अनुसार, आरोपी बच्चों के अश्लील वीडियो बनाकर डार्क वेब के जरिए अंतरराष्ट्रीय पोर्न इंडस्ट्री को बेचते थे. इस तरह वे अवैध कमाई कर रहे थे. इंटरनेट के जरिए चाइल्ड सेक्सुअल एब्यूज मैटेरियल का प्रसार किया जाता था. यह अपराध केवल स्थानीय नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क से जुड़ा था. यही कारण है कि मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई. एजेंसी ने डिजिटल सबूतों को बेहद सावधानी से सुरक्षित किया. अदालत ने इसे संगठित साइबर अपराध माना.

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