
मुल्तानी हत्याकांड: सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब के पूर्व डीजीपी सुमेध सैनी के खिलाफ नई FIR रद्द करने से किया इनकार
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पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह सैनी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने एफआईआर रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि यह राजनीतिक कारणों से कथित घटना के दशकों बाद 2020 में दर्ज की गई थी.
सुप्रीम कोर्ट ने 33 साल पुराने जूनियर इंजीनियर बलवंत सिंह मुल्तानी की हत्या के मामले में पंजाब के पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह सैनी के खिलाफ दर्ज नई एफआईआर में हस्तक्षेप करने से मंगलवार को इनकार कर दिया. इंजीनियर मुल्तानी 1991 में अचानक लापता हो गए थे. बाद में उनकी हत्या का खुलासा हुआ था.
जस्टिस एमएम सुंदरेश और पंकज मिथल की पीठ ने कहा कि मामले में चार्जशीट दाखिल किए जाने के बाद के घटनाक्रम को देखते हुए वह एफआईआर में हस्तक्षेप नहीं करना चाहेगी. हालांकि, शीर्ष अदालत ने कहा कि पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के 8 सितंबर 2020 के फैसले में दर्ज टिप्पणियां और निष्कर्ष निचली अदालत के समक्ष कार्यवाही में बाधा नहीं बनेंगे.
पीटीआई के मुताबिक, पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह सैनी की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने एफआईआर रद्द करने की मांग करते हुए कहा कि यह राजनीतिक कारणों से कथित घटना के दशकों बाद 2020 में दर्ज की गई थी. उन्होंने कहा कि इस अदालत ने बार-बार पूर्व डीजीपी को राहत दी है, जो एक सम्मानित अधिकारी रहे हैं, और यहां तक कि उन्हें मामले में किसी भी दंडात्मक कार्रवाई से भी बचाया है.
न्यायमूर्ति सुंदरेश ने कहा कि चूंकि मामले में आरोप पत्र दाखिल किया जा चुका है, इसलिए वह इस स्तर पर एफआईआर को रद्द करने पर विचार नहीं कर सकते. पीठ ने कहा कि सैनी ट्रायल कोर्ट के समक्ष कार्यवाही का सामना कर सकते हैं और उन्हें उचित मंच के समक्ष चुनौती दे सकते हैं.
5 जनवरी, 2021 को शीर्ष अदालत ने पंजाब सरकार से इस मामले में पूर्व डीजीपी सुमेध सिंह सैनी के खिलाफ दर्ज ताजा एफआईआर में दाखिल आरोप पत्र को रिकॉर्ड पर रखने को कहा था. शीर्ष अदालत ने 1991 में मुल्तानी के लापता होने और हत्या के मामले में दर्ज नए मामले में सैनी को पहले ही अग्रिम जमानत दे दी थी.
शीर्ष अदालत ने 3 दिसंबर, 2020 को 33 साल पुरानी इस घटना में दर्ज नए मामले में सैनी को अग्रिम जमानत दी थी. और 33 साल पुराने मामले में उन्हें अग्रिम जमानत देने से इनकार करने वाले पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज कर दिया था. शीर्ष अदालत ने कहा था कि वर्तमान मामले में एफआईआर दर्ज करने में हुई देरी निश्चित रूप से अग्रिम जमानत देने के लिए एक वैध विचार हो सकता है.

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