
मीटिंग में कई बार ऊंघते दिख ट्रंप, क्या है दिमाग का स्टैंडबाय मोड, जिसकी वजह से ऐसे मौकों पर आती हैं झपकियां?
AajTak
लगभग 79 साल के डोनाल्ड ट्रंप अमेरिकी इतिहास में सबसे उम्रदराज राष्ट्रपति हैं. उनके हाथों पर कई बार ऐसे निशान दिखे जो नसों से दवा लेने पर होते हैं. वे कसरत को बोरिंग बताते हैं. लेकिन सबसे आम है उनकी नींद. वे कई मीटिंग्स और प्रेस वार्ताओं के दौरान झपकी लेते दिखे. तो क्या ट्रंप थक चुके हैं, या मीटिंग्स में सभी को नींद आती है?
डोनाल्ड ट्रंप ने आते ही ढेरों एग्जीक्यूटिव आदेशों पर दस्तखत किए. वे लगातार यात्रा कर रहे हैं. कई देशों में युद्ध रुकवाने का दावा भी कर रहे हैं. लेकिन इसी बीच उन्हें कई सारी मीटिंग्स में ऊंघता हुआ पाया गया. इसे लेकर वे घेरे भी जा रहे हैं कि क्या उनकी उम्र अब पद से तालमेल नहीं बैठा सकेगी. हालांकि सार्वजनिक सभाओं या कॉफ्रेंस में झपकियां आना आम बात है, साइंस में जिसका जवाब भी है.
साइंस डायरेक्ट में ट्रंप की नींद को लेकर एक स्टडी हुई. इसके मुताबिक, वे पहले कार्यकाल से ही सुबह 6 बजे उठ जाते हैं. इसमें कोई फेरबदल नहीं दिखा. वहीं उनके सोने का समय लगातार आगे खिसकता जा रहा है. पहले वे 11 बजे तक सोने चले जाते थे, जबकि अब रात 2 बजे तक वे सोशल मीडिया पर एक्टिव रहते हैं. मतलब साफ है कि वे सोने के आदर्श समय से बहुत कम वक्त की नींद ले पा रहे हैं. ऐसे में दोपहर के वक्त झपकियां आना मामूली है, खासकर जब कोई मीटिंग चल रही हो.
मीटिंग्स या कॉन्फ्रेंस में लोगों का ऊंघना कोई नई बात नहीं. लगभग हर कामकाजी शख्स ने महसूस किया होगा कि जैसे ही लंबी मीटिंग की शुरुआत होती है, आंखें भारी होने लगती हैं. कई रिपोर्ट्स कहती हैं कि इस दौरान 50 से 60 प्रतिशत लोग जम्हाई लेते हैं, जबकि 25 फीसदी लोग झपकियां तक ले लेते हैं.\
जर्नल ऑफ ऑक्युपेशनल हेल्थ साइकोलॉजी के अनुसार, इस समय दिमाग स्टैंड बाय मोड में चला जाता है. जब एक शख्स बोल रहा हो तो ज्यादा लोग उसमें शामिल नहीं हो पाते. करने को कोई खास काम न होने पर मस्तिष्क अपने-आप शांत होने लगता है. ठीक वैसे ही जैसे मोबाइल इस्तेमाल न होने पर स्टैंडबाय में चला जाता है. इसी से झपकियां आने लगती हैं.
अक्सर मीटिंग्स बंद कमरे में एसी चलाकर की जाती हैं. लंबी मीटिंग हो और लोग ज्यादा हों तो कमरे में ऑक्सीजन की कमी होने लगती है. इससे ब्रेन तक ऑक्सीजन की सप्लाई कम हो जाती है, जिससे सुस्ती आती है. कई बार इसमें लंच का भी रोल होता है. खाने के बाद शरीर पाचन के लिए ज्यादा खून भेजता है, जिससे ब्रेन तक सप्लाई थोड़ी कम हो जाती है. इससे भी उबासी आती है. इसे आम भाषा में फूड कोमा कहा जाता है.
कई बार लंबे समय तक सिर्फ सुनते रहने पर दिमाग को एक्टिव रहने का संकेत नहीं मिलता. नतीजा यह होता है कि वो खुद को लो-एनर्जी मोड में डाल देता है और कोई स्टिमुलस न मिलने से नींद आने लगती है.













