
महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर नहीं हैं कई राज्य, सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता
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दिल्ली में जहां 2014 में दिल्ली उच्च न्यायालय के फैसले के बाद सुरक्षा अधिकारी के लिए अलग भर्ती नियम बनाए गए थे, वहां केवल 16 सुरक्षा अधिकारी नियुक्त हैं, जबकि स्वीकृत पद 23 हैं. जो सुरक्षा अधिकारी नियुक्त भी हैं वे 15 साल से अनुबंध के आधार पर काम कर रहे हैं.
यशी (बदला हुआ नाम) ने 1999 में ग्रेजुएशन के बाद शादी कर ली. पेशे से फ्लाइट इंजीनियर उसके पति ने नौकरी नहीं करने के लिए राजी कर लिया. 2004 में यशी ने बेटे को जन्म दिया, तब तक वह नियमित रूप से पति की ओर से शारीरिक हिंसा का शिकार होती रही. कई सालों तक ये सिलसिला चलता रहा. इसके बाद यशी ने टीवी सीरियल्स में एक्टिंग करना शुरू किया, इस बीच उसे दूसरा बच्चा हुआ.
उसने कुछ दिन बाद अपने बेटों को बाल कलाकार के रूप में काम कराया. रुपये-पैसे का हिसाब भी पति के पास होता था. 2017 के बाद यशी के बड़े बेटे ने अपने पिता के व्यवहार की नकल शुरू कर दी. पहले मौखिक और फिर शारीरिक रूप से उसने अपनी मां को प्रताड़ित करना शुरू कर दिया.
अक्टूबर 2020 में यशी आखिरकार उसी बिल्डिंग के दूसरे फ्लैट में चली गई, जो पति के साथ संयुक्त मालिकाना हक वाली थी. कुछ दिनों बाद, उसके पति ने फ्लैट का EMI देना बंद कर दिया, जिससे यशी को अदालतों के दरवाजे खटखटाने के लिए मजबूर होना पड़ा. घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत यशी ने सुरक्षा की मांग की. मामला एक साल से अधिक समय तक चला और फरवरी 2022 में मजिस्ट्रेटने पति को फ्लैट का EMI देने के लिए अंतरिम आदेश दिया.
यह एक ऐसी महिला की दुर्दशा की कहानी है जो शिक्षित है, घर के बाहर काम करती है और उसकी सामाजिक पहचान भी है.
NGO से संबंध रखने वाली वकील शोभा गुप्ता के अनुसार, उन्होंने घरेलू हिंसा अधिनियम (डीवी एक्ट) पर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है. अब तक सामने आए मामलों से पता चलता है कि यशी उन कुछ भाग्यशाली महिलाओं में से थी, जिन्हें मदद मिली.
एक्ट के प्रावधानों के एग्जिक्यूशन में कमी को लेकर सुनवाई कर रहा सुप्रीम कोर्ट

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