
महाराष्ट्र सरकार ने सावरकर ट्रस्ट को स्कूल के लिए आवंटित की वडाला में जमीन, 75 करोड़ की है कीमत
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राज्य मंत्रिमंडल ने यह फैसला एक विशेष मामले के रूप में लिया, जबकि राज्य के राजस्व और वित्त विभागों ने यह सुझाव दिया था कि इस प्रकार की जमीन के आवंटन के लिए 2019 की नीति का पालन किया जाना चाहिए. उस नीति के अनुसार, इस तरह के प्लॉट्स को आवंटित करने से पहले सार्वजनिक रूप से विज्ञापन दिया जाना चाहिए ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके
महाराष्ट्र सरकार ने शुक्रवार को वीर सावरकर चैरिटेबल ट्रस्ट को वडाला इलाके में एक प्रमुख सॉल्ट पैन (खारे पानी की) जमीन पर प्राथमिक और माध्यमिक शैक्षणिक संस्थान बनाने के लिए सीधा आवंटन करने का फैसला किया है. यह जमीन 6,320 वर्ग मीटर क्षेत्रफल में फैली है और इसकी कुल अनुमानित कीमत 75.5 करोड़ रुपये है.
राज्य मंत्रिमंडल ने यह फैसला एक विशेष मामले के रूप में लिया, जबकि राज्य के राजस्व और वित्त विभागों ने यह सुझाव दिया था कि इस प्रकार की जमीन के आवंटन के लिए 2019 की नीति का पालन किया जाना चाहिए. उस नीति के अनुसार, इस तरह के प्लॉट्स को आवंटित करने से पहले सार्वजनिक रूप से विज्ञापन दिया जाना चाहिए ताकि पारदर्शिता सुनिश्चित की जा सके और उचित बोली प्रक्रिया हो सके. हालांकि, इस विशेष मामले में सरकार ने सीधे आवंटन का निर्णय लिया.
क्यों खास है यह जमीन? वडाला में स्थित यह सॉल्ट पैन जमीन मुंबई के महत्वपूर्ण और मूल्यवान क्षेत्रों में से एक मानी जाती है. ऐसे भूखंड, जो मुंबई जैसे महानगरों में बहुत कम बचे हैं, उनके आवंटन पर राज्य सरकार की नीतियां अक्सर कड़ी होती हैं. इसलिए, इस जमीन का आवंटन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है. सरकारी सूत्रों का कहना है कि वीर सावरकर चैरिटेबल ट्रस्ट को यह जमीन सामाजिक और शैक्षणिक उद्देश्यों के लिए आवंटित की जा रही है, जिससे शिक्षा के क्षेत्र में विकास को बढ़ावा मिलेगा. ट्रस्ट द्वारा प्राथमिक और माध्यमिक शैक्षणिक संस्थान की स्थापना का उद्देश्य क्षेत्र के बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करना है.
हालांकि, राजस्व और वित्त विभागों द्वारा उठाए गए सवालों के बावजूद, इस निर्णय को मंजूरी दे दी गई है. 2019 की नीति के तहत ऐसी जमीनों का आवंटन सार्वजनिक रूप से विज्ञापन देकर और उचित प्रक्रिया के माध्यम से किया जाना चाहिए, लेकिन इस मामले में इसे विशेष मामला मानते हुए नियमों से छूट दी गई है. यह फैसला विपक्षी दलों और समाज के कुछ वर्गों में चर्चा का विषय बन सकता है, क्योंकि इस तरह के मामलों में पारदर्शिता की मांग अक्सर की जाती है.

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