
भूख से हो रही मौतें, खुद UN दे रहा चेतावनी, फिर गाजा को अकालग्रस्त घोषित करने से क्यों बच रही हैं एजेंसियां?
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गाजा पट्टी में रहने वाली 20 लाख से बड़ी आबादी पूरी तरह से बाहरी मदद पर निर्भर है. वहां पहले से ही इकनॉमी ध्वस्त थी और पिछले साल अक्टूबर में शुरू हुई हमास-इजरायल जंग के बाद बची-खुची व्यवस्था भी खत्म हो गई. संयुक्त राष्ट्र लगातार भूख से खत्म हो रहे लोगों की बात कर रहा है. अकाल की स्थिति है लेकिन आधिकारिक तौर पर नहीं.
पिछले साल अक्टूबर में इजरायल और आतंकी गुट हमास के बीच लड़ाई शुरू हुई. हमास चूंकि गाजा पट्टी से काम करता है, लिहाजा जंग में गाजा लगभग तबाह हो गया. यह दुनिया की सबसे घनी आबादी वाले इलाकों में से एक है तो जाहिर है कि जंग का असर आम लोगों पर भी हुआ. संयुक्त राष्ट्र का दावा है कि पट्टी में रहने वाली बड़ी आबादी भुखमरी से जूझ रही है. लेकिन इस सबके बाद भी फिलिस्तीनी क्षेत्र को अकालग्रस्त घोषित नहीं किया जा रहा. इसकी क्या वजह हो सकती है?
अभी कैसी स्थिति है मई के आखिर में यूएन ने चेताया था कि गाजा को तुरंत मदद न मिले तो दो ही दिनों में दस हजार से ज्यादा बच्चों की मौत हो सकती है. इससे पहले भी कई चेतावनियां दी जा चुकीं. हालात वाकई भयावह हैं भी. लगभग दो दशक से घेराबंदी झेल रहे इस इलाके को इजरायल के साथ-साथ पड़ोसियों जैसे मिस्र ने भी कंट्रोल में रखा ताकि वहां के लोग बाहर न आ-जा सकें. कई बार इसे खुली जेल कहा जा चुका, जहां के लोग जीने-खाने के लिए बाहरी मदद पर निर्भर रहे. हाल में खाने का इंतजार करते बहुत से लोगों की भी इजरायली हमले में मौत हो गई. कुल मिलाकर, गाजा पट्टी अकाल के मुहाने पर खड़ी है.
तब क्षेत्र को अकालग्रस्त क्यों नहीं माना जा रहा किसी भी इलाके को अकालग्रस्त घोषित करने के कुछ तय मानक होते हैं, जो यूएन एजेंसियां ही तय करती हैं. वे यह चेक करती हैं कि हालात कितने गंभीर हैं कि उसे अकाल माना जा सके. ये डिक्लेयर करने के लिए तीन कंडीशन्स होनी चाहिए - कम से कम 20 फीसदी आबादी बेहद गंभीर खाद्य संकट से जूझ रही हो. - हर दस हजार में से कम से कम दो लोगों की मौत रोज भूख से हो रही हो. - पांच साल से कम उम्र के हर तीन में एक बच्चा कुपोषण का शिकार हो.
तब क्या गाजा अकालग्रस्त नहीं हो सकता है. इसकी वजह भी है. युद्धग्रस्त इलाके में मदद करने वाली एजेंसियों की पहुंच काफी कम हो जाती है. ऐसे में दूरदराज से या सुनी-सुनाई जानकारी ही मिल पाती है. तब हो सकता है कि सही डेटा तक पहुंच ही न हो. लड़ाई के हालात में सर्वे करना, सटीक आंकड़े जुटाना बेहद मुश्किल हो जाता है.
कई बार राजनीतिक प्रेशर और इंटरनेशनल दखल भी होता है. कई बार कुछ देश नहीं चाहते कि किसी इलाके को अकालग्रस्त घोषित किया जाए क्योंकि अगर ऐसा हो तो उनके खिलाफ इंटरनेशनल स्तर पर एक्शन हो सकता है. ऐसा कई बार हो चुका. जैसे सोमालिया में साल 2011 के दौरान दो लाख से ज्यादा लोगों की भूख से मौत हो गई. अकाल भी उसी साल घोषित हुआ, जबकि स्थिति लंबे समय से खराब थी.
अल-कायदा से जुड़ा एक संगठन अल-शबाब देश के कई हिस्सों पर कब्जा कर चुका था. वो किसी भी इंटरनेशनल एड एजेंसी को भीतर आने नहीं दे रहा था. यहां तक कि रेड क्रॉस की एंट्री भी रुकी हुई थी. इस आतंकी गुट ने मदद पहुंचाने वाली संस्थाओं पर हमले शुरू कर दिए ताकि लोग बाहर अटके रहें. अमेरिका समेत तमाम वेस्ट ने डर के चलते सहायता रोक दी. जब तक मामला कुछ शांत हुआ, काफी नुकसान हो चुका था.

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