
भारत-चीन के बीच तनाव का 'पहाड़' कैसे हटा? मोदी-जिनपिंग को बातचीत की टेबल पर लाने में पुतिन का क्या रहा रोल
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यह वह समय था, जब अमेरिका और तमाम यूरोपीय देश रूस पर एक के बाद एक प्रतिबंध लगाते जा रहे थे. पुतिन समझ गए थे कि अमेरिका को टक्कर देने के लिए रूस को भारत और चीन का सपोर्ट हासिल करना होगा. लेकिन रूस की चुनौती थी गलवान की घटना के बाद से भारत और चीन के बीच के कोल्ड वॉर को खत्म कराना.
रूस में वोल्गा और कजानका नदी के मुहाने पर बसा कजान शहर इस समय सत्ता का केंद्र बना हुआ है. यूक्रेन युद्ध के बाद से अमेरिका और यूरोप को ठेंगा दिखाते रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की मेजबानी में कई देशों के राष्ट्रप्रमुख कजान में जुटे हैं. लेकिन सबकी नजरें एशिया की दो बड़ी पावर चीन और भारत पर टिकी हुई हैं. लेकिन 2020 में गलवान की घटना के बाद नरेंद्र मोदी और शी जिनपिंग का एक साथ एक छत के नीचे होना यकीनन बड़ी खबर है. मगर अहम सवाल है कि चार साल के टकराव और गतिरोध के बाद चीन के तेवर नरम कैसे पड़ गए? पीएम मोदी और जिनपिंग बातचीत की टेबल तक कैसे पहुंचे? इस सैन्य गतिरोध को सुलझाने में पुतिन की भूमिका क्या थी?
1962 की जंग के बाद अतीत में बेमुश्किल ही ऐसा मौका आया, जब भारत और चीन के सैनिक सीमा पर इस तरह लहूलुहान हुए. लेकिन 15 जून 2020 को गलवान घाटी पर जो कुछ हुआ, उसने एशिया की इन दो महाशक्तियों के बीच की खाई को और गहरा कर दिया. हालांकि, इस बीच दोनों देशों के बीच लगातार सैन्य और राजनयिक स्तर पर बातचीत होती रही. लेकिन समस्याएं जस की तस बनी रहीं.
फिर आया साल 2022 जब रूस ने अमेरिका की धमकियों को दरकिनार कर यूक्रेन पर धावा बोल दिया. पूरी दुनिया बेशक दो खेमों में बंटी नजर आई. लेकिन यूक्रेन का समर्थन करने वाले देशों की संख्या रूस की तुलना में कहीं ज्यादा रही. लेकिन पावर बैलेंसिंग के इस गेम में भारत और चीन संभवत: दो ऐसे देश रहे, जिन्होंने ना तो खुलकर रूस का समर्थन किया और ना ही विरोध.
यह वह समय था, जब अमेरिका और तमाम यूरोपीय देश रूस पर एक के बाद एक प्रतिबंध लगाते जा रहे थे. एक्सपर्ट्स का मानना है कि पुतिन समझ गए थे कि अमेरिका को टक्कर देने के लिए रूस के लिए भारत और चीन का सपोर्ट बहुत जरूरी है. लेकिन गलवान की घटना के बाद से भारत और चीन के बीच के कोल्ड वॉर को खत्म करना चुनौती थी.
क्या SCO समिट में लिख दी गई थी एग्रीमेंट की स्क्रिप्ट!
चीन के विदेश मंत्री और पोलित ब्यूरो के सदस्य वांग यी को चीन में राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बाद दूसरा सबसे ताकतवार नेता माना जाता है. इस साल जुलाई में कजाकिस्तान में शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की बैठक से अलग विदेश मंत्री जयशंकर ने चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की थी, मुद्दा एलएसी सैन्य गतिरोध को सुलझाना था.

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

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