
बांग्लादेश में अब तक हुए 3 रेफरेंडम के नतीजे बता रहे हैं कि आगे क्या होगा...
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जिसकी सत्ता, उसका रेफरेंडम. यही ट्रेंड है अब तक बांग्लादेश में हुए सभी जनमत संग्रह का. और जनता से जो फैसला चाहा गया, उसके पक्ष में वोट थोड़े मोड़े नहीं बल्कि 90 फीसदी से लगभग सौ फीसदी तक पड़े. कहा जा रहा है कि अंतरिम सरकार चला रहे मोहम्मद यूनुस अपनी सत्ता पर पकड़ कायम रखने के लिए यही रेफरेंडर का शिगुफा लाए हैं.
बांग्लादेश में अब चौथा बड़ा रेफरेंडम हो रहा है. यह 12 फरवरी 2026 को आम चुनाव के साथ होगा. रेफरेंडम का सवाल है कि जनता ‘जुलाई चार्टर’ को लागू करना चाहती है या नहीं. इसे 47 बड़े बदलावों के पैक की तरह पेश किया गया है, जिनका संविधान में संशोधन कर के असर होगा. लेकिन इससे पहले देश में तीन रेफरेंडम हो चुके हैं. हर एक अपने समय की राजनीति और ताकत के अनुरूप था. जाहिर उसका रिजल्ट भी वैसा ही आया. पुराने तीन में से दो रेफरेंडम तो सैनिक तानाशाहों ने अपनी सत्ता पर पकड़ मजबूत करने के लिए कराया. फिर किसकी मजाल थी जो फैसला उनकी मनमर्जी का न आता.
पहला रेफरेंडम 30 मई 1977 में हुआ था. उस समय जनता से पूछा गया था कि क्या वे पोलिटिकल और पॉलिसी फैसलों के लिए राष्ट्रपति जियाउर रहमान पर भरोसा रखते हैं. लगभग 88% लोगों ने मतदान किया और 98.88% ने ‘हां’ में जवाब दिया. दूसरा रेफरेंडम 21 मार्च 1985 में हुआ था. उस वक्त राष्ट्रपति हुसैन मुहम्मद एरशाद देश चला रहे थे. लोगों से पूछा गया कि क्या वे उनकी नीतियों का समर्थन करते हैं और चाहते हैं कि वे तब तक प्रशासन चलाएं जब तक चुनावों के जरिये नागरिक सरकार नहीं बन जाती. यहां भी जवाब ‘हां’ में मिला, वो भी 94% से ज्यादा.
तीसरा रेफरेंडम 15 सितंबर 1991 में हुआ. यह बड़ी वजह से था. उस वक्त देश ने फिर से पार्लियामेंटरी सरकार वापस लाने का फैसला किया. सवाल था कि क्या राष्ट्रपति को संविधान की बारहवीं संशोधन बिल को मंजूर करना चाहिए या नहीं. इस पर लगभग 84% लोगों ने ‘हां’ कहा. ये तीनों रेफरेंडम अलग अलग दौर के थे. कुछ में जनता से भरोसा मांगा गया और कुछ में संविधान को बदलने की मंजूरी. इन सबका असर राजनीति और शासन की दिशा पर गहरा रहा है. तब के सत्ताधारियों के पक्ष में.
क्या यूनुस कायम रखना चाहते हैं सत्ता पर पकड़?
डेढ़ साल से बांग्लादेश की सत्ता संभाल रहे मोहम्मद यूनुस के फैसले विवादों में ही रहे. उन्हें अंतरिम सरकार सौंपी गई थी, लेकिन बहुत दबाव के बाद वे चुनाव के लिए तैयार हुए. जिस तरह उनकी सरकार चुनाव से ठीक पहले तक फैसले ले रही थी, यह माना जा रहा था कि वे सत्ता पर पकड़ छोड़ना नहहीं चाहते. यूनुस देश के नाम अपने संबोधन में कह चुके हैं कि वे चुनाव बाद नई सरकार को प्रभार सौंपकर चले जाएंगे. कायस हैं कि शायद वे अपने यूनुस सेंटर में फिर से काम करने लगेंगे. लेकिन, उनके आलोचक यह आशंका जता रहे हैं कि वे सत्ता में अपनी दखल कायम रखना चाहते हैं. क्योंकि, वे असाधारण रूप से रेफरेंडम के पक्ष में, मतलब ‘हां’ के लिए प्रचार कर रहे हैं. संविधान सुधार के नाम पर, या किसी और सरकारी ढांचे को खड़ा करने के नाम पर वे अगली सरकार की डिसिजन मेकिंग में शामिल रहना चाहते हैं.

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