
पूर्वोत्तर की जंग में बीजेपी-कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पार्टियों के लिए क्या है दांव पर
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पूर्वोत्तर के त्रिपुरा, मेघालय और नागालैंड विधानसभा चुनाव का ऐलान हो गया है. पूर्वोत्तर की जंग में बीजेपी और कांग्रेस के साथ-साथ क्षेत्रीय पार्टियों की भी साख दांव पर लगी है. पूर्वोत्तर के चुनावी नतीजे 2023 में होने वाले बाकी राज्यों के चुनाव के साथ-साथ 2024 के लोकसभा चुनाव पर भी सियासी प्रभाव डालेगा. ऐसे में देखना है कि पूर्वोत्तर का किला कौन फतह करता है?
पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में चुनाव ऐलान के साथ सियासी तपिश बढ़ गई है. त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड के विधानसभा चुनाव का ऐलान हो गया है. त्रिपुरा में 16 फरवरी और बाकी दोनों राज्यों में 27 फरवरी को मतदान होगा जबकि नतीजे 2 मार्च को आएंगे. पूर्वात्तर की जंग बीजेपी और कांग्रेस के लिए काफी अहम मानी जा रही है, क्योंकि इस चुनाव के नतीजे 2023 में होने वाले चुनाव के भविष्य की सियासत को तय करने वाले हैं. इसीलिए मिशन-2024 का सेमीफाइल माना जा रहा है. इसीलिए बीजेपी और कांग्रेस के लिए किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है? त्रिपुरा में बीजेपी अपने दम पर सरकार में है तो मेघालय और नगालैंड में सहयोगी के तौर पर सरकार में शामिल हैं. 2014 के बाद से बीजेपी पूर्वोत्तर में सबसे बड़ी सियासी ताकत के रूप में उभरी है. ऐसे में बीजेपी के सामने पूर्वोत्तर में अपने सियासी वर्चस्व को बचाए रखने की चुनौती है तो कांग्रेस एक बार फिर से सत्ता में वापसी के लिए बेताब है. हालांकि. कांग्रेस के लिए अपने राजनीतिक अस्तित्व बचाने-बढ़ाने की चुनौती इन चुनावों में रहेगी.
त्रिपुरा, मेघालय और नगालैंड में कांग्रेस का संगठन कमजोर हुआ है और उसकी जगह टीएमसी जैसे दलों ने तेजी से अपना पसार रही है. ममता बनर्जी का पूरा फोकस पूर्वोत्तर के राज्यों में कांग्रेस का विकल्प बनने की है, जिसके लिए उन्होंने अपना पूरा फोकस केंद्रित कर रखा है. इसके चलते ही कांग्रेस ने त्रिपुरा में लेफ्ट पार्टी के साथ गठबंधन कर लिया है, क्योंकि उसके साथ-साथ लेफ्ट के लिए भी टीएमसी एक बड़ी चुनौती बन गई है. त्रिपुरा का मुकाबला त्रिकोणीय बन रहा है, जिसमें बीजेपी, टीएमसी और कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के बीच होगा.
2023 में 9 राज्यों में चुनावी जंग
बता दें कि साल 2023 में जिन नौ राज्यों में विधानसभा चुनाव होने हैं, उनमें तीन राज्यों में बीजेपी की अपने दम पर सरकार है, जबकि तीन राज्यों में वह सरकार में सहयोगी की भूमिका निभा रही है. बीजेपी त्रिपुरा, कर्नाटक और मध्य प्रदेश में अपने दम पर सत्ता में है जबकि मेघालय में एनपीपी और नगालैंड में नेशनलिस्ट डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी की सरकार में सहयोगी दल के रूप में शामिल हैं.
कांग्रेस अपने दम पर सिर्फ दो राज्यों में छत्तीसगढ़ और राजस्थान की सत्ता में है जबकि पांच साल पहले 2018 में चुनाव हुए तो चार राज्यों में सरकार बनाने में सफल रही थी, लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कर्नाटक और मध्य प्रदेश ऑपरेशन लोट्स के जरिए कांग्रेस के हाथों से छीन लिया था. तेलंगाना में केसीआर सत्ता पर काबिज हैं. ऐसे में पूर्वोत्तर के इन तीनों राज्यों के चुनावी नतीजों का आगामी चुनाव पर भी प्रभाव पड़ेगा, जिसके चलते बीजेपी और कांग्रेस के साथ-साथ क्षेत्रीय दल भी पूरी ताकत झोंक दी है.
त्रिपुरा की चुनावी जंग अहम त्रिपुरा विधानसभा चुनाव बीजेपी के लिए जितना अहम है, उससे कम कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन के लिए नहीं है. 2018 के चुनाव में बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज कर राज्य में दशकों से जारी वाम मोर्चा के शासन का अंत किया था. इस राज्य में पार्टी ने शून्य सीट से बहुमत हासिल करने और मत प्रतिशत में 41 फीसदी बढ़ोतरी का कीर्तिमान बनाया था. बीजेपी अपनी सत्ता को एक बार फिर से बचाए रखने की कवायद में जुटी है, जिसके लिए मुख्यमंत्री का चेहरा भी पिछले साल बदल दिया है ताकि सत्ता विरोधी लहर को मात दिया जा सके.

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