
पहले किया बेहोश, फिर पहनाया बुर्का...आगरा में बदमाश ने लड़की को दूसरी बार किया किडनैप
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उत्तर प्रदेश के आगरा में सरेआम किशोरी का अपहरण करने से हड़कंप मच गया. खास बात है कि अपहरणकर्ता ने पहले लड़की को बुर्का पहनाया, फिर उसे अगवा कर लिया.
उत्तर प्रदेश के आगरा में सरेआम किशोरी का अपहरण करने से हड़कंप मच गया. खास बात है कि अपहरणकर्ता ने पहले लड़की को बुर्का पहनाया, फिर उसे अगवा कर लिया. यह पूरी वारदात सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई. अपहरण की सूचना पाकर हरकत में आई पुलिस ने लड़की की तलाश शुरू कर दी है. आगरा के न्यू आगरा थाना क्षेत्र के दयालबाग में एक युवक ने किशोरी का दिनदहाड़े अपहरण कर लिया. इस घटना के बाद पुलिस हरकत में आ गई. घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी फुटेज को खंगाला गया. सीसीटीवी फुटेज में किशोरी के अपहरण की पूरी वारदात कैद हो गई थी. छानबीन में पता चला कि फुटेज में आरोपी युवक मेहताब नजर आ रहा है.
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आज बात पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दंगल की जहां टीएमसी और बीजेपी के बीच कड़ा मुकाबला है. बंगाल की सियासत इस वक्त अपने चरम पर है, जहां हर बयान, हर कदम और हर मंच चुनावी रणनीति का हिस्सा बन चुका है. कल ईद के मौके पर मंदिर -मस्जिद का रंग देखने को मिला. ममता बनर्जी ने कोलकाता में ईद के मौके पर बीजेपी के घुसपैठिए वाले मुद्दे पर अबतक का सबसे बड़ा पलटवार किया. ईद-उल-फितर के मौके पर कोलकाता के रेड रोड पर आयोजित एक बड़े धार्मिक कार्यक्रम में ममता ने पीएम मोदी को सबसे बड़ा घुसपैठिया बता दिया. ये वही मुद्दा है जिस पर पीएम मोदी लगातार ममता सरकार को घेर रहे हैं. ममता के बयान पर बीजेपी ने हार की हताशा में दिया गया बयान बताया. वहीं बीजेपी ने भी बंगाल में अपने वोटरों को मैसेज दिया है. शुभेंदु अधिकारी कालीघाट मंदिर में जाकर पूजा-अर्चना की और मां काली से आशीर्वाद मांगते हुए कहा कि बंगाल में घुसकर बांग्लादेशी घुसपैठियों ने बहुत अत्याचार किया है. बंगाल में अगले महीने दो चरण में वोटिंग होनी है. ऐसे में जैसे-जैसे तारीख नजदीक आएगी, बयान और भी तीखे होंगे और सियासी चालें और भी पेचीदा. लेकिन सवाल ये कि क्या बंगाल मंदिर-मस्जिद की राजनीति से बाहर निकल पाएगी. इस बार बंगाल में किस पार्टी की नैरेटिव का सिक्का चलेगा. बीजेपी-टीएमसी की आमने-सामने की लड़ाई में आखिर कांग्रेस और कभी 34 साल तक लगातार सरकार में रहने वाली लेफ्ट क्या कर रही है.

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विश्व जल दिवस पर 'जल है तो कल है' जैसे नारे सुनने में तो अच्छे लगते हैं, लेकिन जमीन पर हकीकत आज भी बहुत कड़वी है. सरकारी कागजों में 'हर घर जल' के बड़े-बड़े दावे तो दिखते हैं, पर असलियत में आज भी लोगों को प्यास बुझाने के लिए दूर-दूर तक पैदल चलना पड़ रहा है. कई परिवारों को तो पानी के लिए खुद कुएं तक खोदने पड़ रहे हैं. जब तक पानी के लिए यह जानलेवा संघर्ष और लंबी कतारें खत्म नहीं होतीं, तब तक ये जल दिवस सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख बनकर ही रह जाएगा.







