
'...तो दिल्ली तक आ जाएगा थार का रेगिस्तान', अरावली को लेकर वाटरमैन राजेंद्र सिंह की CJI को चिट्ठी
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वाटरमैन ऑफ इंडिया के नाम से मशहूर पर्यावरणविद् और जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह ने मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को पत्र लिखकर अरावली की नई परिभाषा वाले सुप्रीम कोर्ट के 20 नवंबर के फैसले पर गहरी चिंता जताई है. उन्होंने कहा कि हालिया फैसले से अरावली में खनन को बढ़ावा मिलेगा और थार मरुस्थल के दिल्ली तक फैलने का खतरा है.
अरावली पर्वतमाला से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट में होने वाली सुनवाई से ठीक पहले ‘जल पुरुष’ के नाम से विख्यात जल संरक्षण कार्यकर्ता राजेंद्र सिंह ने भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को एक पत्र लिखकर 20 नवंबर को दिए गए शीर्ष अदालत के फैसले पर गहरी चिंता जताई है. उन्होंने निर्णय में आवश्यक बदलाव कर अरावली में रहने वाले पशु-पक्षियों के जीवन, जल और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण का आग्रह किया है.
राजेंद्र सिंह ने अपने पत्र में लिखा है कि अरावली पर्वतमाला सदियों से जीवन, प्रकृति, जल और भूमि के संरक्षण का आधार रही है. सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय अत्यंत पीड़ादायक है, क्योंकि इसके जरिए अरावली का सीमांकन और विभाजन कर दिया गया है. इससे अरावली का समग्र पारिस्थितिकी तंत्र हजारों छोटी पहाड़ियों में टूट गया है और 90 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र खनन व निर्माण कार्यों के लिए खुल गया है. उन्होंने चेतावनी दी कि दिल्ली-हरियाणा सीमा पर 100 मीटर ऊंची कोई पहाड़ी नहीं है, ऐसे में अरावली के संरक्षित क्षेत्र नए खनन के लिए खुल सकते हैं और थार रेगिस्तान दिल्ली तक पहुंच सकता है.
राजेंद्र सिंह ने कहा कि अरावली कोई वस्तु नहीं बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र है, जिसे हवाओं, मानसून, भूजल भंडार, जल संचयन प्रणालियों, वनस्पति, वन्यजीव और जैव विविधता ने लाखों वर्षों में आकार दिया है. ऐसे में अरावली को किसी एक मापदंड के आधार पर परिभाषित या सीमांकित करना संभव नहीं है. पत्र में उन्होंने 100 मीटर, 50 मीटर ऊंचाई और ढलान से जुड़े फैसले के गंभीर नकारात्मक प्रभावों को सर्वे ऑफ इंडिया के नक्शों पर स्वतंत्र एजेंसियों के माध्यम से दर्शाने की आवश्यकता बताई. उन्होंने कहा कि अरावली का भौगोलिक और ऐतिहासिक महत्व सर्वविदित है और सुप्रीम कोर्ट स्वयं कई बार इसे स्वीकार कर चुका है.
राजेंद्र सिंह ने जलवायु परिवर्तन, बढ़ते प्रदूषण और सांस लेने योग्य हवा के संकट का उल्लेख करते हुए कहा कि ऐसे समय में अरावली को किसी भी प्रकार का नुकसान मानव जीवन के लिए घातक होगा. उन्होंने स्पष्ट रूप से मांग की कि अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह के खनन और विकासात्मक गतिविधियों को पूरी तरह अस्वीकार किया जाना चाहिए. उन्होंने याद दिलाया कि 1994 में उनकी याचिका पर न्यायमूर्ति वेंकटचैया की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरिस्का में 478 खानों को बंद करने का आदेश दिया था. आज फिर उसी तरह की न्यायिक चेतना और साहसिक निर्णय की आवश्यकता है. उन्होंने चेतावनी दी कि अरावली का विनाश मानव सभ्यता के विनाश के समान होगा और इसकी भरपाई कभी संभव नहीं हो सकेगी.

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