
डेनमार्क में हुआ मासूम बच्चों को 'मॉडर्न' बनाने वाला खौफनाक प्रयोग, परिवार से बिछड़े बच्चे करने लगे खुदकुशी
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दूसरे विश्व युद्ध के दौरान कई ताकतवर देशों ने कमजोर मुल्कों पर खौफनाक प्रयोग किए. ये प्रयोग आमतौर पर वयस्कों पर किए जाते थे, लेकिन डेनमार्क ने सबको पीछे छोड़ दिया. वो अपने अधीन आने वाले देश ग्रीनलैंड के बच्चों के साथ ही अमानवीय हो गया. उसने तथाकथित पिछड़े ग्रीनलैंडिंक बच्चों को मॉर्डन बनाने के नाम पर उन्हें परिवार से अलग कर डेनिश परिवारों को सौंप दिया.
रूस-यूक्रेन जंग के बीच रूस पर आरोप लग रहा है कि वो यूक्रेनियन बच्चों को अवैध रूप से अपने यहां ले जा रहा है. इस मामले में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन तक आरोपों के घेरे में हैं. वैसे दो देशों की लड़ाई या कब्जे के बीच ऐसी खबरों का आना नई बात नहीं. बच्चे सॉफ्ट टारगेट होते हैं, जिन्हें कब्जे में करना, या बहलाना आसान होता है. कुछ ऐसा ही सोचते हुए डेनमार्क ने भी पचास के दशक में एक प्रयोग किया. उसने री-एजुकेट कर मॉर्डन बनाने के नाम पर वहां के बच्चों को उनके माता-पिता से अलग कर दिया.
कौन रहता था ग्रीनलैंड में तब ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन हुआ करता था. वहां एक ट्राइब था- इनूएट, जिसकी आबादी सबसे ज्यादा थी. बेहद बर्फीले इलाकों में रहने वाली ये जनजाति दुनिया से खास मतलब नहीं रखती. वे बर्फ-लकड़ी के बने आधे अंडरग्राउंड घरों में रहते और कच्चा मांस, मछलियां और रेंडियर की सींग बेचकर अपना पेट भरते. शिकार पकड़ने के लिए वे सील की खाल से बनी नावों पर यहां से वहां जाया करते थे.
डेनिश लोग उन्हें पिछड़ा पाते 18वीं सदी से लेकर साल 1979 से पहले तक डेनमार्क का ग्रीनलैंड पर कब्जा रहा. इस दौरान इस नॉर्डिक देश ने पाया कि ग्रीनलैंड के मूल निवासी काफी पिछड़े हुए हैं. ये वही इनूएट थे, जो शिकार करके जीवन बिताते. साल 1951 में डेनिश सरकार ने इस जनजाति को आधुनिक बनाने की ठानी. उन्होंने तय किया कि आधुनिकता तभी आएगी, जब ग्रीनलैंडिक बच्चे आधुनिक बन सकें. इसके लिए पूरी रूपरेखा तैयार हुई और एक्सपेरिमेंट को नाम मिला- लिटिल डेन्स.
किस तरह का था खाका इसके तहत 22 इनूएट बच्चों को उनके परिवारों से जबरन ले लिया गया. तय हुआ कि डेनिश परिवार इन बच्चों को पालेंगे-पोसेंगे और फिर एडल्ट होने पर उन्हें अपने देश वापस भेज दिया जाएगा.
प्रयोग को डिजाइन करते हुए कुछ शर्तें बनाई गईं. जैसे बच्चे अनाथ हों तभी उन्हें दूसरे देश भेजा जाए. दूसरा- उनकी उम्र 4 से 6 साल तक ही हो ताकि वे नए पेरेंट्स और कल्चर को अपना सकें. हालांकि हुआ कुछ अलग ही. 13 लड़कों और 9 लड़कियों के इस ग्रुप में लगभग सभी का परिवार जीवित था. उन्हें जबरन परिवारों से अलग करके कोपेनहेगन भेज दिया गया.
बच्चों को इंफेक्शन फैलाने वाला माना गया वहां जाने के बाद भी ऐसा नहीं हुआ कि नई फैमिली खुले दिल से उन्हें अपनाए, बल्कि उन छोटे-छोटे बच्चों को आइसोलेशन में रख दिया गया. दरअसल तत्कालीन डेनिश प्रशासन को डर था कि पिछड़े हुए ये बच्चे संक्रामक बीमारी के वायरस फैला सकते हैं. लगभग दो महीनों बाद बच्चों को फॉस्टर फैमिलीज को सौंपा गया. यहां उन्हें अपनी भाषा भुलाकर डेनिश लैंग्वेज सीखनी पड़ी. खान-पान और रहन-सहन का तरीका भी एकदम अलग हो गया. लगभग सालभर बाद 6 बच्चों को डेनिश परिवारों ने ही गोद ले लिया.

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