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डराना छोड़ दे तो क्या हिल सकती है अमेरिका की गद्दी, क्यों लंबे समय से वर्ल्ड ऑर्डर में नहीं हुआ बड़ा फेरबदल?

डराना छोड़ दे तो क्या हिल सकती है अमेरिका की गद्दी, क्यों लंबे समय से वर्ल्ड ऑर्डर में नहीं हुआ बड़ा फेरबदल?

AajTak
Monday, January 05, 2026 10:06:47 AM UTC

अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अरेस्ट करते हुए वहां अपनी सेना की तैनाती कर दी. डोनाल्ड ट्रंप का कहना है कि नई और मजबूत सरकार बनते तक यूएस वहां रहेगा. ड्रग तस्करी के आरोप के आधार पर हुए यूएस एक्शन का कई देश विरोध कर रहे हैं, लेकिन कोई भी इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सका. वॉशिंगटन ग्लोबल पावर है, जिसके आगे किसी का बस नहीं चलता.

दूसरे विश्व युद्ध के बाद वर्ल्ड ऑर्डर बदला और एक नई ताकत सीधे सुपरपावर बन गई. ये अमेरिका था. तब से लगभग आठ दशकों से कोई देश या संयुक्त शक्ति यूएस को अपनी जगह से नहीं हिला सकी. अमेरिका महज आरोपों के आधार पर वेनेजुएला के राष्ट्रपति को अरेस्ट कर चुका और सत्ता परिवर्तन की बात कर रहा है, इसके बाद भी दुनिया आलोचना से ज्यादा कुछ कर नहीं पा रही. कौन से कारण हैं, जो अमेरिका को इतना शक्तिशाली बनाते हैं? क्या ये महज डॉलर का रुतबा है, या फिर सेना, या भूगोल?

दूसरे वर्ल्ड वॉर के बाद अमेरिका ग्लोबल पावर बनकर उभरा. इसकी सबसे बड़ी वजह यह थी कि युद्ध ने यूरोप और एशिया की ज्यादातर बड़ी ताकतों को तबाह कर दिया था, जबकि अमेरिका की जमीन पर लड़ाई नहीं हुई. उसकी फैक्ट्रियां सुरक्षित रहीं और युद्ध के दौरान अमेरिकी उद्योग ने हथियार और सामान बनाकर जबरदस्त आर्थिक ताकत हासिल कर ली.

युद्ध खत्म होने तक दिखने लगा था कि वर्ल्ड ऑर्डर बदल सकता है. पहले सोवियत संघ सबसे मजूबत था, जिसके बाद यूरोप के कुछ देश आते थे. लेकिन शीत युद्ध के आखिर में सोवियत संघ 15 टुकड़ों में टूट गया. रूस अब नया उत्तराधिकारी था. ताकतवर लेकिन बंटवारे की वजह से पहले से कमजोर. यूरोप के बड़े देश जैसे जर्मनी और फ्रांस जंग में बर्बाद हो चुके थे. यूरोप की इकनॉमी सिकुड़कर 18 प्रतिशत हो चुकी थी, जबकि जापान की आधी रह गई थी. 

चीन और भारत अभी इकनॉमिक बूम से दूर थे. बचा अमेरिका. उसके पास काफी सारा गोल्ड था और डॉलर इंटरनेशनल करेंसी बन गया. आईएमएफ और वर्ल्ड बैंक जैसे संस्थान बने, जिनमें अमेरिका की अहम भूमिका थी. यूएन को भी उसने काफी सारी फंडिंग की और तय किया कि इंटरनेशनल मंच हमेशा उसके पक्ष में रहे. 

सैन्य ताकत ने देश को अलग स्तर पर पहुंचा दिया. वह पहला और अकेला देश था जिसने परमाणु बम बनाया और इस्तेमाल भी किया. इसके बाद नाटो जैसे सैन्य गठबंधनों के जरिए उसने यूरोप की सुरक्षा की जिम्मेदारी ले ली. मार्शल प्लान के तहत अमेरिका ने युद्ध से तबाह यूरोपीय देशों की आर्थिक मदद दी. इससे उसका वहां रसूख बढ़ा. उसने पक्का किया कि तबाह हो चुके देश किसी भी तरह से रूस से नजदीकी न बढ़ाएं. 

एक तरफ वो दबदबा बढ़ा रहा था, दूसरी तरफ लोकतंत्र और पूंजीवाद के मॉडल को बढ़ावा देकर उसने खुद को फ्री वर्ल्ड के नेता की तरह पेश किया. ताकत से खिंचते हुए ज्यादातर सभी देश उसके पाले में आ गए. रूस अकेला दुश्मन था, जो कमजोर पड़ा हुआ था. तो इस तरह धुआं छंटने के बाद साफ दिखने लगा कि अमेरिका ग्लोबल ताकत बन चुका है. 

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