
जेपी के बढ़ते प्रभाव से चिंतित इंदिरा ने शुरू किया था चिंतन शिविर, 9 साल पहले राहुल को मिला था प्रमोशन
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कांग्रेस अपनी दशा और दिशा को तय करने के लिए शुक्रवार से तीन दिन तक राजस्थान के उदयपुर में चिंतन शिविर आयोजित कर रही है. नौ साल पहले राजस्थान के जयपुर के चिंतन शिविर में कांग्रेस ने राहुल गांधी को महासचिव से प्रमोशन कर राष्ट्रीय उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया था. कांग्रेस के सियासी इतिहास में यह पांचवा चिंतन शिविर हो रहा है.
कांग्रेस अपने राजनीतिक इतिहास में सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. कांग्रेस अपनी संगठनात्मक कमजोरियों पर आत्ममंथन और 2024 के लिए दशा-दिशा तय करने शुक्रवार से तीन दिन तक राजस्थान में मंथन करेगी. उदयपुर के चिंतन शिविर में बीजेपी से मुकाबले के लिए कांग्रेस रणनीति बनाएगी और उसे अमलीजामा पहनाकर कई राज्यों में सत्ता वापसी की इबारत लिखेगी. सोनिया गांधी के कार्यकाल में पचमढ़ी, शिमला और जयपुर के बाद चौथा चिंतन शिविर उदयपुर में हो रहा है जबकि कांग्रेस के इतिहास में यह पांचवी चिंतन बैठक है.
हालांकि, कांग्रेस में इस तरह की चिंतन बैठकों की परंपरा पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दौर में ही शुरू हो गई थी, लेकिन बाद में कांग्रेस में अधिवेशनों के जरिए पार्टी की रणनीति और मुद्दों पर चर्चा होती थी. सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति के कदम रखने के बाद चिंतन शिविर का सिलसिला फिर शुरू और अब नौ साल के बाद उदयपुर में कांग्रेस मंथन करेगी. ऐसे में सवाल उठता है कि कांग्रेस के अब तक हुए चिंतन शिविर में क्या-क्या रणनीति तय की गई थी और उसे अमलीजामा पहनाने में पार्टी कितनी कामयाब रही.
9 साल पहले जयपुर में चिंतन शिविर
कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जनवरी 2013 में जयपुर में चिंतन शिविर अयोजित किया गया था. इसी बैठक में राहुल गांधी को महासचिव से कांग्रेस उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया था. इस तरह जयपुर चिंतन शिविर में पार्टी की चिंतन से ज्यादा राहुल गांधी के प्रमोशन पर चर्चा हुई और कांग्रेस में सोनिया के बाद राहुल पार्टी में दूसरे नंबर के ओहदे वाले नेता बन गए थे. इस तरह कांग्रेस का यह चिंतन शिविर राहुल गांधी के इर्द-गिर्द सिमटा रहा, लेकिन जिस तरह सोनिया और राहुल के कसीदे पढ़े गए उनसे पार्टी को कुछ हासिल नहीं हुआ है.
कांग्रेस ने जयपुर के चिंतन शिविर में फैसला किया कि प्रदेश अध्यक्ष और जिलाध्यक्ष लोकसभा या विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेंगे. अगर उन्हें चुनाव लड़ना है तो अपना पद छोड़ना होगा. इस शिविर में 2014 का लोकसभा चुनाव, महिला सशक्तीकरण, युवाओं की भागीदारी बढ़ाने, महंगाई पर अंकुश लगाने और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने मंथन जरूर किया गया था, लेकिन पार्टी इसे अमलीजामा नहीं पहना सकी.
चिंतन शिविर में इस बात पर चर्चा ही नहीं हुई थी कि दस साल की सत्ता विरोधी लहर को कैसे निष्प्रभावी बनाया जाए और न ही इस बात पर चर्चा हुई कि देश में उठ रही मोदी लहर को कैसे रोका जाए. इसी का नतीजा था कि कांग्रेस का परफॉर्मेंस सबसे नीचे चला गया. साल 2014 के चुनाव में कांग्रेस की शर्मनाक हार हुई. कांग्रेस अब तक दर्जनों विधानसभा चुनाव हार चुकी है और 2019 के चुनाव में भी कांग्रेस को करारी शिकस्त मिली.

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