
जिस UN को फेल बता रहे डोनाल्ड ट्रंप, उसकी 'नाकामी' की जड़ें अमेरिकन हिस्ट्री में ही छुपी हैं!
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आज जब डोनाल्ड ट्रंप संयुक्त राष्ट्र को नाकाम बता रहे हैं तो वे दरअसल अपनी ही राष्ट्रीय नीतियों की असफलताओं को छुपा रहे हैं. द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान फ्रैंकलीन डी रूजवेल्ट और हेनरी ट्रूमैन का दुनिया से वादा था. दो विश्व युद्धों की तबाही के बाद ऐसी संस्था बनाने का जो दुनिया की सबसे बड़ी पंचायत होगी. लेकिन 1945 के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति सिलसिलेवार तरीके से इस वादे से धीरे धीरे हटते चले गए.
"मुझे कोई दिक्कत नहीं है, मैं बिना टेलीप्रॉम्पटर के ही भाषण दूंगा, क्योंकि टेलीप्रॉम्पटर काम ही नहीं कर रहा है. बिना टेलीप्रॉम्पटर के आप दिल की बातें ज्यादा कहते हैं, लेकिन मैं सिर्फ ये कहना चाहता हूं कि जो कोई भी इस टेलीप्रॉम्पटर को ऑपरेट कर रहा है वो बड़ी मुसीबत में है." अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने UNGA में अपनी दूसरी पारी की पहली स्पीच इन्हीं हल्के-फुल्के शब्दों के साथ शुरू की. लेकिन जैसा कि उन्होंने अपने स्पीच में कहा बिना टेलीप्रॉम्पटर के आप दिल की बातें ज्यादा कहते हैं, तो उन्होंने इस स्पीच में दिल की बातें ही कही. हालांकि वो लिखा हुआ नोट पढ़ रहे थे.
ट्रंप ने UN (संयुक्त राष्ट्र) के मंच से UN को फेल करार दिया. उसी UN को, जिसकी स्थापना में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति फ्रैंकलिन डी. रूजवेल्ट और बाद में हैरी ट्रूमैन का बड़ा रोल था. इन दो पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपतियों ने इसे विश्वव्यवस्था का आधार बताया, जहां बड़ी ताकतें मिलकर वैश्विक संकटों का समाधान करने वाली थीं.
लेकिन इसी संगठन की तीखी आलोचना करते हुए ट्रंप ने कहा कि, "संयुक्त राष्ट्र का उद्देश्य क्या है? ऐसा लगता है कि वे बस एक बहुत ही कड़े शब्दों वाला पत्र लिखते हैं और फिर उस पत्र पर कभी अमल नहीं करते. ये खोखले शब्द हैं और खोखले शब्दों से युद्ध का समाधान नहीं होता."
इसके बाद ट्रंप ने रूस-यूक्रेन वॉर, ईरान मुद्दे को सुलझाने में नाकाम रहने पर यूएन की आलोचना की.
माइग्रेशन के मुद्दे पर ट्रंप ने संयुक्त राष्ट्र पर बरसते हुए कहा कि 2024 में संयुक्त राष्ट्र ने 624,000 प्रवासियों को अमेरिका में आने और हमारी दक्षिणी सीमा में घुसपैठ करने में मदद करने के लिए 372 मिलियन डॉलर नकद खर्च किए. आगे उन्होंने कहा, "संयुक्त राष्ट्र का काम घुसपैठ को रोकना है, उन्हें बढ़ावा देना नहीं."
ट्रंप ने यूएन को सिर्फ "बातों का मंच" बताया और वास्तविक एक्शन में फिसड्डी करार दिया.

लेकिन अब ये कहानी उल्टी घूमने लगी है और हो ये रहा है कि अमेरिका और चीन जैसे देशों ने अमेरिका से जो US BONDS खरीदे थे, उन्हें इन देशों ने बेचना शुरू कर दिया है और इन्हें बेचकर भारत और चाइना को जो पैसा मिल रहा है, उससे वो सोना खरीद रहे हैं और क्योंकि दुनिया के अलग अलग केंद्रीय बैंकों द्वारा बड़ी मात्रा में सोना खरीदा जा रहा है इसलिए सोने की कीमतों में जबरदस्त वृद्धि हो रही हैं.

इस वीडियो में जानिए कि दुनिया में अमेरिकी डॉलर को लेकर कौन सा नया आर्थिक परिवर्तन होने वाला है और इसका आपके सोने-चांदी के निवेश पर क्या प्रभाव पड़ेगा. डॉलर की स्थिति में बदलाव ने वैश्विक बाजारों को हमेशा प्रभावित किया है और इससे निवेशकों की आर्थिक समझ पर भी असर पड़ता है. इस खास रिपोर्ट में आपको विस्तार से बताया गया है कि इस नए भूचाल के कारण सोने और चांदी के दामों में क्या संभावित बदलाव आ सकते हैं तथा इससे आपके निवेश को कैसे लाभ या हानि हो सकती है.

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