
हर तरफ बारूद की गंध, मलबे से झांकता लोहे का ढेर... लेबनान में जमींदोज ब्रिज से ग्राउंड रिपोर्ट
AajTak
एयरस्ट्राइक के बाद तबाही के बीच पसरा सन्नाटा, डर और अनिश्चितता, यही था उस सुबह का सच. दक्षिणी लेबनान के अल-कसामाया ब्रिज पर सबसे पहले पहुंचे आजतक के रिपोर्टर अशरफ वानी ने सिर्फ मलबा ही नहीं, बल्कि खामोशी का बोझ भी देखा.
एयरस्ट्राइक को मुश्किल से 8 घंटे ही हुए थे, हवा में बारूद की गंध महसूस की जा सकती थी, लेकिन ऐसी तबाही के बाद जहां कभी भीड़, हलचल और आवाजें होती थीं, वहां सन्नाटा पसरा था. डर ने इस जगह को खाली कर दिया था. पुल तक जाने वाली सड़कें सूनी थीं, आसपास के घर बंद पड़े थे, मानो जिंदगी ने खुद को रोक लिया हो और पीछे हट गई हो. मैंने एक दिन पहले वहां पहुंचने की कोशिश की थी, लेकिन देरी, अनिश्चितता और दोबारा हमले के खतरे ने मुझे रोक दिया. सोमवार सुबह मैं आखिरकार मौके पर पहुंचा, पूरी तरह अकेले.
खामोशी बेहद भारी थी. पुल अब पुल नहीं रहा था. वह एक टूटा हुआ ढांचा बन चुका था, लोहे की छड़ें टूटी हड्डियों की तरह बाहर निकली थीं, कंक्रीट के बड़े-बड़े टुकड़े नीचे नदी में बिखरे पड़े थे. वहां किसी इंसान की मौजूदगी न होने से यह तबाही और भी डरावनी लग रही थी, जैसे सन्नाटे में उसकी आवाज सुनाई दे रही हो. मैंने चारों ओर देखा, न कोई राहत दल, न आम लोग, न कोई पत्रकार. सिर्फ टूटी संरचनाओं से टकराती हवा की आवाज. डर ने वो कर दिखाया था, जो धमाका भी नहीं कर सका, उसने सबको वहां से भगा दिया थात्र
उस पल मैं सिर्फ एक पत्रकार नहीं था, बल्कि इस तबाही के मंजर का एकमात्र चश्मदीद था. मैंने अपना माइक्रोफोन संभाला. एक छोटा सा, जाना-पहचाना सा काम, जिसने मुझे उस कठिन पल में संभाल लिया. भारत में बैठे लोग जल्द ही ये तस्वीरें देखेंगे, लेकिन वे उस खालीपन को महसूस नहीं कर पाएंगे, जो सीने पर बोझ बनकर याद दिलाता है कि सब कुछ कितना नाजुक है. मैंने रिपोर्टिंग शुरू की. मेरी आवाज सन्नाटे को चीरती हुई निकली, स्थिर, लेकिन भीतर कहीं गहराई लिए हुए. मैंने तबाही के पैमाने के बारे में बताया, इस पुल की अहमियत के बारे में बताया.
यह भी पढ़ें: सैदा से ग्राउंड रिपोर्ट: 6000 साल पुराने शहर पर जंग की मार, दक्षिणी लेबनान तबाही के कगार पर
कैसे यह दक्षिण लेबनान में लोगों को आपस में जोड़ता था, और इसके टूटने से किसानों का खेतों से, मरीजों का अस्पतालों से और परिवारों का एक-दूसरे से संपर्क टूट गया था. लेकिन इस पेशेवर अंदाज के पीछे एक अनकही सच्चाई थी: अगर कुछ फिर हुआ, तो वहां कोई नहीं था. न भागने के लिए, न मदद के लिए. वक्त जैसे थम गया था. हर दूर की आवाज ज़्यादा तेज लग रही थी. हर पल एक सवाल लेकर आता था, क्या यह सच में खत्म हो गया है?
फिर धीरे-धीरे सन्नाटा टूटने लगा. दूर से कुछ वाहन आते दिखे. स्थानीय और अंतरराष्ट्रीय पत्रकार, जो यह सुनकर मौके पर पहुंच रहे थे कि कोई वहां पहले से मौजूद है. कैमरे, उपकरण, आवाजें. डर से जकड़ी जगह पर जिंदगी धीरे-धीरे लौटने लगी. लेकिन तभी आसमान का मिजाज फिर बदल गया. हवाई जहाजों की आवाज ने सन्नाटे को चीर दिया. बातचीत थम गई. एक और हवाई हमला हुआ, सीधे हम पर नहीं, लेकिन इतना करीब कि साफ संदेश मिल जाए: यह खत्म नहीं हुआ है.

ईरान-इजरायल युद्ध आज अपने 24वें दिन में प्रवेश कर चुका है, लेकिन शांति की कोई गुंजाइश दिखने के बजाय यह संघर्ष अब एक विनाशकारी मोड़ ले चुका है. ईरान द्वारा इजरायल के अराद और डिमोना शहरों पर किए गए भीषण मिसाइल हमलों से दुनिया हैरान है. ये शहर रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हैं, इसलिए अब यह जंग सीधे तौर पर परमाणु ठिकानों की सुरक्षा के लिए खतरा बन गई है. युद्ध का सबसे घातक असर ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ा है.

तेल टैंकरों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्ता खोलने को लेकर ईरान को ट्रंप ने 48 घंटे की धमकी थी. समय सीमा खत्म होने से पहले ही नेटो एक्शन में आ गया है. नेटो महासचिव ने बताया कि होर्मुज में मुक्त आवाजाही सुवनिश्चित करने के लिए 22 देशों का समूह बन रहा है. साथ ही उन्होनें कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिका का कदम जरूरी था.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को होर्मुज पर धमकी अब उन्हीं पर उलटी पड़ चुकी है. ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे की डेडलाइन देकर होर्मुज खोलने को कहा था, जिसके बाद अब ईरान ने ट्रंप के स्टाइल में ही उन्हें जवाब देते हुए कहा कि यदि अमेरिका उनपर हमला करेगा तो ईरान भी अमेरिका के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाएगा.

आज यु्द्ध का 24वां दिन है. इजरायल पर ईरान और जवाब में अमेरिका और इजरायल के ईरान पर ताबड़तोड़ हमले जारी हैं. इस बीच सवाल ये कि क्या डोनाल्ड ट्रंप हॉर्मुज पर फंस गए हैं. ट्रंप के बार-बार बदलते बयानों से लग रहा है कि जंग छेड़ने से पहले हॉर्मुज को लेकर ट्रंप सोच नहीं पाए थे. देखें कैसे बदलते जा रहे ट्रंप के बयान.









