
जिस देश ने एक तीतर के लिए युद्ध किया वो शरण में आई शेख हसीना को कैसे बांग्लादेश को सौंप देगा...
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गुजरात में 1474 के युद्ध में तीतर की रक्षा के लिए राजपूतों, ब्राह्मणों, ग्वालों और हरिजनों की एकजुट सेना ने चाबड़ जनजाति के शिकारीयों से लड़ाई लड़ी, जिसमें 140 से 200 लोग मारे गए. यह घटना भारतीय सभ्यता में शरण देने और अभयदान की परंपरा को दिखाती है. बांग्लादेश जो बार-बार हसीना को सौंपने की मांग कर रहा है, उसे भारत के इतिहास के बारे में थोड़ी जानकारी ले लेनी चाहिए.
गुजरात में सदियों से कवि और भाट एक वीरगाथा गा रहे हैं. यह वीरगाथा उस घटना की है जब चाबड़ जनजाति के शिकारी एक तीतर का पीछा कर रहे थे. घायल तीतर भागकर सोढ़ा परमार राजपूतों के तंबू में शरण ले लेता है. उस तीतर की रक्षा के लिए 100 से अधिक लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दे दी. सुरेंद्रनगर जिले के मुली में मौजूद स्मृति-शिलाएं 1474 में हुए इस युद्ध की गवाही देती हैं.
इस संघर्ष में राजपूतों, ब्राह्मणों, ग्वालों और हरिजनों की एकजुट सेना ने चाबड़ शिकारियों से युद्ध किया. अलग-अलग विवरणों के अनुसार, इस लड़ाई में चाबड़ शिकारियों से लड़ते हुए 140 से 200 लोग मारे गए. लड़ाई में शिकारियों को भारी नुकसान हुआ और घायल तीतर के लिए लड़ाई में 400 से अधिक शिकारी मारे गए. आज भी मुली में तीतर को श्रद्धा की नजर से देखा जाता है.
जिस धरती के लोगों ने एक तीतर की रक्षा के लिए अपनी जान तक दे दी, उनसे यह उम्मीद करना मुश्किल है कि वो भारत के मित्र माने जाने वाले किसी इंसान को दुश्मनों के हवाले कर देंगे. बांग्लादेश बार-बार अपदस्थ प्रधानमंत्री और अवामी लीग प्रमुख शेख हसीना को सौंपने की मांग कर रहा है.
मुली के तीतर के मामले से अलग, शेख हसीना के मामले में कानून, निष्पक्ष न्याय और द्विपक्षीय संधियों जैसे पहलू भी लागू होते हैं. शेख हसीना 5 अगस्त 2024 से भारत में हैं. शरण मांगने वाले की रक्षा करना धर्म माना जाता है. यह भारतीय सभ्यता का मूल संस्कार रहा है, जिसकी झलक महाकाव्यों की कथाओं में भी मिलती है.
1975 में, जब शेख हसीना के पिता और बांग्लादेश के तत्कालीन राष्ट्रपति मुजीबुर रहमान की उनके परिवार समेत हत्या कर दी गई थी तब शेख हसीना अपने बच्चों, पति और बहन के साथ भारत आ गईं. वो छह साल तक(1981 तक) नई दिल्ली के पंडारा रोड पर एक अलग पहचान के तहत रहीं.
शरण लेने वाले की रक्षा को नैतिक कर्तव्य मानने का उल्लेख 16वीं सदी में लिखी गई तुलसीदास की रामचरितमानस में भी मिलता है. वो लिखते हैं, 'जो अपने अहित के भय से शरण आए व्यक्ति को त्याग देता है, वह नीच और पापी होता है, और उसका दर्शन भी अशुभ होता है.'

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