
जम्मू-कश्मीर में विधानसभा चुनाव हारकर भी कैसे 'जीत' गई बीजेपी? । Opinion
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सरकार जानती थी कि चुनाव जीतने के उनकी पार्टी ने उचित तैयारी अभी नहीं कर सकी है फिर भी कश्मीर मे चुनाव संपन्न करवाया गया. बीजेपी भले ही जम्मू कश्मीर में सरकार नहीं बना पा रही है पर एक राष्ट्र के निर्माण के रूप में कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव करवाकर दुनिया भर को संदेश है कि जम्मू-कश्मीर के लोगों ने प्रचंड बहुमत से भारतीय लोकतंत्र पर मुहर लगाई है.
जम्मू-कश्मीर की 90 विधानसभा सीटों पर वोटों की गिनती जारी है. दोपहर दो बजे तक की मतगणना में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस गठबंधन बहुत आराम से बहुमत के आंकड़े को पार करती नजर आ रही है. ये गठबंधन अभी 50 सीटों पर आगे चल रहा है. वहीं, बीजेपी 26 सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. महबूबा मुफ्ती की पीडीपी पांच सीटों पर ही आगे चल रही है. निर्दलीय और छोटी पार्टियां 9 सीटों पर आगे हैं. जम्मू पहले की तरह बीजेपी को बढ़त मिलती दिख रही है. जम्मू रीजन में जब सीटों की सख्या कम होती थी तब भी बीजेपी लगातार कई चुनावों से 25 से 26 सीटों को जीतती रही है. 2014 और 2007 में जब सीटें बढ़ाकर 43 सीटें कर दी गई तो भी बीजेपी 26 पर ही आगे है. जबकि, कश्मीर घाटी में बीजेपी एक भी सीट पर आगे नहीं है. मतलब साफ है कि बीजेपी अनुच्छेद 370 को जम्मू कश्मीर से हटाकर भी जहां थी वही हैं. बीजेपी के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है पर एक देश और राष्ट्र के रूप में यह खुशी की वजह है.
1- धारा 370 हटाने के बाद, चुनाव का कामयाब संचालन किया
मोदी सरकार ने वादा किया था कि वह जम्मू-कश्मीर को अलग-थलग पड़ने नहीं दिया जाएगा. सरकार बहुत पहले से कहती रही है कि जम्मू कश्मीर में चुनाव जल्द ही होंगे. इस बीच सुप्रीम कोर्ट का आदेश आ गया कि जम्मू कश्मीर में सरकार अतिशीघ्र चुनाव करवाए. सरकार चाहती तो कानून व्यवस्था का हवाला देकर चुनाव में अड़ंगा लगा सकती थी. पर सरकार ने न चाहते हुए भी अपना वादा पूरा किया. सरकार जानती थी कि चुनाव जीतने के उनकी पार्टी ने उचित तैयारी अभी नहीं हो सकी है फिर भी कश्मीर मे चुनाव संपन्न करवाया गया. बीजेपी भले ही जम्मू कश्मीर में सरकार नहीं बना पा रही है पर एक राष्ट्र के निर्माण के रूप में कश्मीर में सफलतापूर्वक चुनाव करवाना दुनिया भर को संदेश है कि भारत ने कश्मीर पर अवैध कब्जा नहीं किया हुआ है. कश्मीर में शांतिपूर्ण चुनाव होते हैं और सभी को अपना मनपसंद जनप्रतिनिधि चुनने का अधिकार है.
2- कोई बायकॉट कॉल नहीं, बंपर वोटिंग हुई
जम्मू कश्मीर में पिछले कई दशकों से जो चुनाव हो रहे हैं वो आतंक के साये में होते रहे हैं. तमाम आतंकी गुटों की दहशत के साये में चुनाव सही मायने में चुनाव नहीं थे.क्योंकि बहुत से लोग वोट नहीं करते और बहुत से लोग चुनाव नहीं लड़ते थे. कई बार वोटिंग परसेंटेज इतना कम होता था कि वो पूरी आबादी का 10 परसेंट भी नहीं कहा जा सकता था. बीजेपी के 'नया कश्मीर' में सुरक्षा पर ज्यादा जोर दिया गया. सरकार ने आतंकवाद, अलगाववाद और पत्थरबाजी के खिलाफ जो कार्रवाई की, उसका लोगों ने स्वागत किया. हालांकि बीजेपी को इसकी कीमत भी चुकानी पड़ी. क्योंकि बहुत से लोगों को ऐसा भी महसूस किया गया कि अभिव्यक्ति की आजादी को दबाया जा रहा है.बीजेपी इस आम धारणा को बदलने में कामयाब नहीं हो सकी कि असहमति को दबाने के लिए डराया जा रहा है.आतंकी गुटों को भी लगा कि अगर निष्पक्ष चुनाव हो रहें हैं तो उसका लाभ उठाना चाहिए.
3- पुराने अलगाववादी नेताओं को चुनाव प्रक्रिया में ले आना

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