
क्या मनोविज्ञान के खिलाड़ी हैं Trump, देशों को धमकाने का उनका तरीका मैडमैन थ्योरी के कितना करीब?
AajTak
मैडमैन थ्योरी एक रणनीति है, जिसमें नेता खुद को बेहद खतरनाक दिखाते हैं ताकि दुश्मन डर जाए और टकराव से पहले ही झुक जाए. अमेरिका के राष्ट्रपति समय-समय पर यह तरीका आजमाते रहे. अब डोनाल्ड ट्रंप को लेकर भी यही कहा जा रहा है. वे एक साथ कई देशों को कभी जंग, कभी टैरिफ के बहाने डरा रहे हैं.
कहते हैं कि जो गरजते हैं, वे बरसते नहीं. यानी ऐसे लोगों से डरने की कोई वजह नहीं, जो बात-बेबात धमकियां देते रहते हैं. हालांकि राजनीति में गजरने वालों से देश डरते भी हैं. यह मैडमैन थ्योरी है, जिसे सबसे पहले अमेरिकी राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने आजमाया था. वियतनाम युद्ध के दौरान उन्होंने खुद को इतना सख्त और अप्रत्याशित दिखाने की कोशिश की कि दुश्मन यह माने कि वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, और वो दबाव में आकर समझौता कर ले. अब ट्रंप के एक्शन्स को भी इसी से जोड़ा जा रहा है.
टैरिफ युद्ध चल रहा है. ट्रंप ग्रीनलैंड के लिए किसी से भी दुश्मनी लेने को तैयार हैं. अलग-अलग देशों पर अमेरिकी प्रशासन सख्त हो चुका. कहीं-कहीं खुले युद्ध के भी आसार हैं. वाइट हाउस इन दिनों बेहद अनप्रेडिक्टेबल बन चुका. आज वहां से जो बयान जारी हो रहे हैं, कल उनका क्या होगा, यह तक तय नहीं. दोस्त-दुश्मन के बीच लकीर हल्की हो चुकी.
कोल्ड वॉर के दौर के रणनीतिकार डैनियल एल्सबर्ग और थॉमस शेलिंग का कहना था कि अगर कोई नेता यह दिखाए कि वह बहुत सख्त कदम भी उठा सकता है, तो सामने वाला डर जाता है और अपने फैसले बदल लेता है. मैडमैन थ्योरी पहले सिर्फ समझाने के लिए इस्तेमाल होती थी, यानी किसी नेता के अजीब या बेवजह सख्त लगने वाले तौर-तरीकों की वजह बताने के लिए. लेकिन बाद में कुछ नेताओं ने इसे एक रणनीति की तरह भी अपनाया.
यूएस के राष्ट्रपति इस मनोविज्ञान के खिलाड़ी थे. इसकी शुरुआत रिचर्ड निक्सन से हुई. बात साठ के दशक की है, जब अमेरिका- वियतनाम युद्ध कर रहे थे. लड़ाई लंबी खिंचने से खुद उनके देश के भीतर भी विरोध बढ़ रहा था.
निक्सन चाहते थे कि दुश्मन देश डर जाए और बिना ज्यादा उलझे समझौता कर ले. इसके लिए उन्होंने एक खास तरीका अपनाया, जिसे बाद में मैडमैन थ्योरी कहा गया. इसका मतलब था, दुश्मन को भरोसा दिलाना कि राष्ट्रपति इतना सख्त और अनप्रेडिक्टेबल है कि वह कुछ भी कर सकता है, यहां तक कि परमाणु हमला भी.
निक्सन ने जानबूझकर ऐसे संकेत दिए कि वे बहुत गुस्से में हैं और हालात हाथ से निकल सकते हैं. उन्होंने अपने सलाहकारों से कहा वे इस तरह की अफवाह फैलाएं कि यूएस न्यूक्लियर तक जाने को तैयार है अगर उसे ज्यादा उकसाया जाए. यह सब एक सोची-समझी रणनीति थी. लेकिन इसमें खतरा भी था. अगर दुश्मन डरने की बजाय चुनौती दे देता, तो हालात और बिगड़ सकते थे.

ईरान ने दावा किया है कि उसकी नेवी के एयर डिफेंस ने दो अमेरिकी ड्रोन मार गिराए. ईरान की स्टेट मीडिया के मुताबिक ये दोनों सुसाइड ड्रोन कथित तौर पर अमेरिकी सेना के थे. ईरान की सेना के मुताबिक ड्रोन का पता लगाया गया, उसे ट्रैक किया गया और इससे पहले कि वो बंदर अब्बास नौसैनिक बेस को निशाना बनाते, उन्हें मार गिराया गया. देखें वीडियो.

ईरान-इजरायल युद्ध आज अपने 24वें दिन में प्रवेश कर चुका है, लेकिन शांति की कोई गुंजाइश दिखने के बजाय यह संघर्ष अब एक विनाशकारी मोड़ ले चुका है. ईरान द्वारा इजरायल के अराद और डिमोना शहरों पर किए गए भीषण मिसाइल हमलों से दुनिया हैरान है. ये शहर रणनीतिक रूप से अत्यंत संवेदनशील हैं, इसलिए अब यह जंग सीधे तौर पर परमाणु ठिकानों की सुरक्षा के लिए खतरा बन गई है. युद्ध का सबसे घातक असर ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ा है.

तेल टैंकरों के लिए स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का रास्ता खोलने को लेकर ईरान को ट्रंप ने 48 घंटे की धमकी थी. समय सीमा खत्म होने से पहले ही नेटो एक्शन में आ गया है. नेटो महासचिव ने बताया कि होर्मुज में मुक्त आवाजाही सुवनिश्चित करने के लिए 22 देशों का समूह बन रहा है. साथ ही उन्होनें कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिका का कदम जरूरी था.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरान को होर्मुज पर धमकी अब उन्हीं पर उलटी पड़ चुकी है. ट्रंप ने ईरान को 48 घंटे की डेडलाइन देकर होर्मुज खोलने को कहा था, जिसके बाद अब ईरान ने ट्रंप के स्टाइल में ही उन्हें जवाब देते हुए कहा कि यदि अमेरिका उनपर हमला करेगा तो ईरान भी अमेरिका के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बनाएगा.









