
कट्टर विरोधी AIMIM और कांग्रेस संग BJP के अजब गठबंधन की पूरी कहानी, अब 'डैमेज कंट्रोल' में जुटीं पार्टियां
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महाराष्ट्र की सियासत में इन दिनों विचारधारा नहीं, सहूलियत का बोलबाला दिखा. नगर निकाय चुनावों से पहले धुर विरोधी दल सत्ता के लिए एक-दूसरे से गले मिलते दिखे. अंबरनाथ और अकोट में बने असहज गठबंधनों ने सहूलियत की सियासत को उजागर किया है, जहां कुर्सी के आगे सिद्धांत बौने पड़ते नजर आए.
महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में सियासी गणित ने इस बार नई इबारत लिख दी. धुर विरोध की दीवारें लांघते हुए बीजेपी ने दो नगर परिषदों में कांग्रेस और एआईएमआईएम से हाथ मिला लिया. मगर जब दिल्ली और मुंबई तक कानाफूसी तेज हुई, तो सीनियर नेताओं को बीच में आकर इस सियासी ‘मिलन’ पर ब्रेक लगाना पड़ा.
इस कदम ने न सिर्फ सत्ताधारी महायुति बल्कि विपक्षी खेमे में भी असहजता पैदा कर दी. हालात ऐसे बने कि कांग्रेस को एक स्थानीय निकाय में अपने ही 12 नवनिर्वाचित पार्षदों को निलंबित करना पड़ा.
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने साफ किया कि इस तरह के गठबंधन पार्टी नेतृत्व की मंजूरी के बिना किए गए और यह अनुशासनहीनता के दायरे में आते हैं. वहीं, बीजेपी की सहयोगी शिवसेना ने इसे खुले तौर पर 'गठबंधन धर्म' के साथ विश्वासघात करार दिया.
अंबरनाथ और अकोट नगर परिषद में हुआ 'प्रयोग'
20 दिसंबर को हुए स्थानीय चुनावों के बाद बीजेपी ने अपने कट्टर प्रतिद्वंद्वी कांग्रेस और अजित पवार के नेतृत्व वाली राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के साथ मिलकर ‘अंबरनाथ विकास अघाड़ी’ के बैनर तले अंबरनाथ नगर परिषद का नेतृत्व गठित किया. इस राजनीतिक जोड़-तोड़ में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली सहयोगी शिवसेना को सत्ता से बाहर कर दिया गया.
इसी तरह का प्रयोग अकोला जिले के अकोट नगर परिषद में भी देखने को मिला, जहां बीजेपी ने असदुद्दीन ओवैसी के नेतृत्व वाली ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) और अन्य दलों के साथ हाथ मिला लिया.

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