
ईरान का 'हिमालय'... जिसकी सरहदों को नहीं पार कर सका है कोई शत्रु, क्या खामेनेई की सेना को यही बचाएगा
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ईरान का ऊबड़-खाबड़ इलाका, विशाल आकार और मजबूत सुरक्षा व्यवस्था किसी भी जमीनी हमले के लिए बहुत बड़ी रुकावटें पैदा करती हैं, ईरान-इराक युद्ध जैसे ऐतिहासिक उदाहरण इन चुनौतियों को उजागर करते हैं, जहां हमलावर सेनाएं पहाड़ों और रेगिस्तानों के बीच फंस गईं थी. अमेरिका भी ईरान के परमाणु केंद्रों पर हमला कर चुका है, लेकिन पूरी सफलता उसे भी नहीं मिली,
पश्चिम में जाग्रोस पर्वत के नुकीले शिखर, उत्तर में अलबोर्ज़ पर्वतमाला की दुर्गम और दुरुह पहाड़ियां. पूरब में अफगानिस्तान के बॉर्डर के पास पहाड़ों की श्रृंखला और देश के बीच में रेगिस्तान. ये भौगोलिक विस्तार ईरान का है. जिसे प्राकृतिक किला भी कहा जाता है. ईरान की बनावट और बसावट ऐसा है कि इस मुल्क पर जमीनी आक्रमण करना और फतह हासिल करना लगभग असंभव सा है.
इतिहास की लड़ाइयां में ईरान की जंगों का ऐसा ही वर्णन है. अगर हाल के जंगों की बात करें तो ईरान-इराक जंग के दौरान सद्दाम की सेना जाग्रोस की पहाडियों में ही फंसकर रह गई थी.
हां, सिकंदर और मंगोलों ने जरूर ईरान पर विजय हासिल की थी.
आइए समझते हैं कि ईरान कैसे अपने भौगोलिक आकार की वजह से एक नैचुरल किला बन जाता है.
पहाड़ों का कवच
ईरान की भौगोलिक रक्षा पर्वतीय किले, निर्जन रेगिस्तान और संकरे दर्रे करते हैं. ये भौगोलिक विशेषताएं ईरान में आक्रमण को लंबे युद्ध में बदल देती हैं. ज़ाग्रोस पर्वत श्रृंखला देश को उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व में काटती है, जहां कई चोटियां 3,000-4,000 मीटर ऊंची हैं.

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