
'अमीर बच्चे अक्सर दुखी होते हैं...', 'ओ-रोमियो' के एक्टर का बयान, शाहिद कपूर पर कही ये बात
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ओ-रोमियो' में अपनी परफॉर्मेंस के लिए हुसैन को हर तरफ से तारीफें मिल रही हैं. उन्होंने बताया कि उन्हें सबसे ज्यादा खुशी तब होती है जब कोई अनजान व्यक्ति आकर उनके काम की सराहना करता है.
हुसैन दलाल के लिए फिल्म 'ओ-रोमियो' महज एक प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि अपने पसंदीदा डायरेक्टर विशाल भारद्वाज के साथ काम करने का एक सुनहरा सपना सच होने जैसा था. इस फिल्म ने उन्हें अपने पुराने दोस्त शाहिद कपूर के साथ एक बार फिर स्क्रीन शेयर करने का मौका दिया.
इंडिया टुडे के साथ एक खास बातचीत में हुसैन ने बताया कि शाहिद कपूर न केवल एक बेहतरीन एक्टर हैं, बल्कि सेट पर एक ऐसे साथी हैं जो अपने को-स्टार को निखरने का पूरा मौका देते हैं. देवा और फर्जी जैसी फिल्मों में शाहिद के लिए लिखने वाले हुसैन ने बताया कि इस बार कैमरे के सामने उनके साथ जो वक्त बिताया, वह उनके लिए बेहद यादगार रहा.
हुसैन दलाल ने क्या कहा? हुसैन ने कहा, 'शाहिद के साथ उनका तालमेल बहुत पुराना और गहरा है. क्योंकि मैंने देवा और फर्जी लिखी हैं, इसलिए शाहिद के साथ मेरा एक मजेदार इक्वेशन है, और हम दोस्त हैं. हम दोनों साथ काम करने के लिए एक्साइटेड थे, और हमारी एकमात्र चिंता उस समय को सही तरीके से पेश करना था. मैं मझगांव से हूं, और चोर बाजार में पला-बढ़ा हूं, और शाहिद भी बॉम्बे का लड़का है.
एक्टर ने आगे कहा, 'शाहिद बहुत प्रोफेशनल है, और इसलिए वह स्टेप-चेक करता रहता था ताकि हम जो कुछ भी करें, यहां तक कि जिस तरह से हम हंसते हैं या ताली बजाते हैं, वह कंटेंपररी न लगे. मेरा विश्वास करो, वह साथ काम करने के लिए सबसे अच्छे को-एक्टर हैं क्योंकि वह सारा भारी काम करते हैं. वह आपको एक एक्टर के तौर पर उड़ने की जगह देते हैं. विशाल जी और शाहिद दोनों कुछ नया करने के लिए बहुत खुले थे. अगर आप एक काबिल एक्टर हैं, तो यह सबसे अच्छा सेट है क्योंकि यह एक क्रिएटिव सेट था. वह एक काबिल डायरेक्टर हैं, शाहिद, एक काबिल लीड एक्टर. यह बस शानदार था.'
हुसैन ने फिल्म पर क्या कहा? जब उनसे पूछा गया कि क्या उन्होंने इस किरदार को बनाने के लिए अपने बचपन के कुछ ऑब्जर्वेशन को अपनाया, तो हुसैन दलाल ने एक बहुत ही दिलचस्प सीख शेयर की. उन्होंने बताया कि कैसे ज्यादातर फिल्में गरीब या पिछड़े लोगों को दुखी दिखाती हैं. लेकिन, असल में, यह बिल्कुल उल्टा है. उन्होंने कहा, 'अगर आप किसी गरीब देश में जाते हैं, तो वहां सड़कों पर खुश बच्चे दौड़ते हुए मिलेंगे. दूसरी तरफ, टावरों में रहने वाले अमीर बच्चे अक्सर दुखी होते हैं. मुझे नहीं लगता कि इन भावनाओं का आपकी फाइनेंशियल काबिलियत से कोई लेना-देना है. लेकिन क्योंकि भारत में ज्यादातर फिल्में अमीर लोग बनाते हैं, इसलिए हम गरीब लोगों को दुख वाले फिल्टर के साथ शूट करते हैं, जो मुझे बहुत मजेदार लगता है. हम सब बड़े होते हुए गरीब थे, लेकिन कभी दुखी नहीं हुए.'
'विशाल भारद्वाज एक ऐसे फिल्ममेकर हैं जो रियलिज्म पर काम करते हैं, इसलिए उन्हें यह प्रॉब्लम नहीं हुई. उन्होंने उस्तारा और छोटू को खुश लोगों के तौर पर लिखा, क्योंकि वह एलीट लोगों के बीच के फर्क को समझते हैं. तो एक एक्टर के तौर पर, यह मेरी भी जिम्मेदारी थी कि मैं उसमें कुछ और जोड़ूं और इसे एक खुशनुमा कैरेक्टर बनाऊं.'













