International Nurse Day 2021: आसां नहीं है, घर में अपने को रोता छोड़ दूसरे के आंसू पोछना, मगर हमने किया है...
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International Nurse Day 2021: आज इंटरनेशनल नर्स डे है, इस खास दिन पर आइए जानते हैं कि कोरोना काल में डॉक्टरों से इतर हमारे देश की नर्सेज किन हालातों से गुजर रही हैं....
आज जब कोरोना के डर से लोग घरों से निकलने में सहम जाते हैं. ऐसे में रोज हॉस्पिटल में जिंदगी की उम्मीद बनकर डॉक्टरों के कंधे से कंधा मिलाकर नर्सिंग स्टाफ अस्पतालों में डटा है. जब किसी अपने की सांसें टूटने लगती हैं, वे अस्पताल की ओर भागते हैं. यहां डॉक्टर मरीज को देखकर उन्हें आईसीयू या वेंटीलेटर में इलाज करने के लिए रखते हैं. इस पूरे वक्त जब किसी अपने को भीतर आने की इजाजत नहीं होती है तब ये सफेद कपड़े पहने मसीहा इलाज के साथ-साथ उम्मीद बंधा रहे होते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इस बुरे दौर में वो कितनी बार टूटे हैं. मरीजों के सामने मुस्कुराने वाले ये चेहरे कितनी ही बार आंसुओं में सराबोर हो गए हैं. आज इंटरनेशनल डे पर हम आपको कोविड के दौरान ड्यूटी कर रही कुछ नर्सिंग स्टाफ की जिंदगी का ये हिस्सा साझा कर रहे हैं. कमोबेश इनकी बात लाखों नर्सेज की बात से बहुत ज्यादा अलग नहीं है. आइए जानें इनके बारे में और इस खास दिन पर एक सैल्यूट इन्हें भी दें. पहली आपबीती है नोएडा के एक सरकारी अस्पताल में ग्रेड-2 स्टाफ नर्स श्वेता राय की. 14 साल की नौकरी में ये पहला दौर है जब कई बार 12 घंटे की नौकरी के बाद उनका शरीर थककर टूटने के बजाय उनका मन टूटा है. श्वेता बताती हैं कि मैं साल 2007 से जॉब कर रही हूं. नॉर्मल डे में भी हमारा जॉब चैलेंजिंग होता है, लेकिन इतना नहीं होता. तब हम ये नहीं सोचते थे कि काम के दौरान अपनी लाइफ के साथ साथ हम फैमिली की लाइफ भी खतरे में डाल रहे हैं. बीते अप्रैल में पहली बार मैंने अपने पेशे में रहते डर को इतना करीब से महसूस किया. हां किसी के न बच पाने पर दुख बहुत होता था लेकिन हमारे मन में ये तसल्ली होती थी कि हमने बचाने की कोशिश की. पूरा इलाज किया गया लेकिन वो ठीक नहीं हो सका. लेकिन ये ऐसा समय था जब ये डर महसूस हुआ कि हम चाहकर भी मरीजों बचा नहीं पाते थे क्योंकि ऑक्सीजन नहीं थी. श्वेता आगे बताती हैं कि इसी दौरान एक दिन ऐसा भी आया जब मेरी ड्यूटी के दौरान ही छह जवान लेागों की मौत हो गई. हम बिना ऑक्सीजन के उन्हें बचा नहीं सकते थे. उस दिन मैं शिफ्ट खत्म करके सुबह आठ बजे घर पहुंची तो मेरी आंख से आंसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे. उस वक्त बस ये डर बैठ गया कि अब कोई नहीं बचेगा. अगर मेरे परिवार को ही ऐसी कोई जरूरत हुई तो मैं उन्हें ऐसे नहीं देख पाऊंगी. बार बार वही दृश्य मेरी आंखों से गुजर रहा था जब मैं अपने सामने देख रही थी कि कैसे लोग ऑक्सीजन की आस में सांस तोड़ रहे थे. वाकई वो लोग कोरोना से मरना डिजर्व नहीं करते थे. ऑक्सीजन मिलती तो उनका इलाज हो सकता था लेकिन हम कुछ नहीं कर पा रहे थे. वो कहती हैं कि जब हम इस पेशे में आते हैं तो भीतर से ये प्रतिबद्धता होती है कि हम अपनी सेवा भाव से दूसरों की जान बचाने की हर कोशिश करेंगे. जब हॉस्पिटल से लोग मुस्कुराकर घर लौटते हैं तो दिल में कहीं अजीब संतुष्टि महसूस होती है.More Related News

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