
Crime Katha: 20 ट्रकों में दस्तावेज, CBI जांच और 950 करोड़ की सरकारी लूट... जानिए, बिहार के 'चारा घोटाले' की पूरी कहानी
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बिहार के चारा घोटाले ने 950 करोड़ रुपये की सरकारी लूट के साथ पूरे सूबे को हिला कर रख दिया था. 'बिहार की क्राइम कथा' में जानिए, लालू प्रसाद यादव की गिरफ्तारी, सीबीआई जांच, राबड़ी देवी की एंट्री और उस भ्रष्टाचार की पूरी कहानी... जिसने बिहार की राजनीति बदल कर रख दी.
Crime Katha of Bihar: बिहार के इतिहास में ऐसा घोटाला शायद ही कभी हुआ हो, जिसने राजनीति, नौकरशाही और न्यायपालिका तीनों को हिला कर रख दिया हो. यह सिर्फ सरकारी पैसों की चोरी नहीं थी, बल्कि उस सिस्टम का पर्दाफाश था जो दशकों से बेईमानी पर टिका था. ‘चारा घोटाला’ के नाम से मशहूर यह मामला 950 करोड़ रुपये के गबन का था, जिसने एक मुख्यमंत्री की कुर्सी छीन ली और बिहार की राजनीति का रुख ही बदल दिया. 'बिहार की क्राइम कथा' में इस बार जानते हैं, आखिर कैसे शुरू हुआ ये खेल? और किस तरह इस घोटाले में फंसे थे लालू प्रसाद यादव सहित सैकड़ों अधिकारी और नेता.
1970 के दशक में शुरू हुई गड़बड़ी चारा घोटाले की जड़ें 1970 के दशक में पाई जाती हैं, जब बिहार के पशुपालन विभाग में सरकारी खर्च के नाम पर झूठे बिल बनना शुरू हुए. शुरू में यह छोटे स्तर की हेराफेरी थी, लेकिन धीरे-धीरे इसमें अफसरों, सप्लायर्स और नेताओं की मिलीभगत बढ़ती चली गई. सरकारी खजाने से पशुओं के चारे, दवाओं और उपकरणों के नाम पर पैसा निकाला जाता रहा, जबकि असल में ये चीजें कभी खरीदी ही नहीं गईं.
चेतावनी के बावजूद बढ़ता गया भ्रष्टाचार 1985 में तत्कालीन नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) टी.एन. चतुर्वेदी ने बिहार सरकार को चेताया था कि विभागों द्वारा खातों की रिपोर्ट में देरी गबन की ओर इशारा करती है. लेकिन चेतावनी को अनदेखा कर दिया गया. इससे यह साफ हुआ कि उच्च स्तर पर भी भ्रष्टाचार को राजनीतिक संरक्षण मिल रहा था.
सतर्कता विभाग ने खोले राज 1992 में सतर्कता विभाग के निरीक्षक बिधु भूषण द्विवेदी ने अपनी रिपोर्ट में मुख्यमंत्री स्तर तक संलिप्तता की बात कही. लेकिन जांच के बजाय द्विवेदी को ही सजा मिली. उनका तबादला कर दिया गया और बाद में उन्हें निलंबन कर दिया गया इसके बाद वे अदालत के आदेश से बहाल हुए और इस मामले में गवाह बने.
1996 में हुआ बड़ा खुलासा जनवरी 1996 में रांची के युवा उपायुक्त अमित खरे ने चाईबासा कोषागार में अचानक छापा मारा. वहां से मिले दस्तावेजों ने बिहार के सबसे बड़े वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश कर दिया. फर्जी बिलों, काल्पनिक पशुओं और झूठे सप्लायर्स के जरिए करोड़ों रुपये सरकारी खजाने से निकाले गए थे. इस बात की गवाही वो सारे दस्तावेज दे रहे थे, जो छापेमारी की दौरान बरामद किए गए थे.
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