
BMC नोटिस के बाद एक्शन में राणा दंपति, फ्लैट के अवैध निर्माण को करवाएंगे नियमित
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नवनीत राणा और उनके पति की मुसीबत बढ़ती जा रही है. बीएमसी के नोटिस थमाने के बाद अब राणा दंपति अपने अवैध निर्माण को जल्द ही नियमित करवाने वाले हैं. कोर्ट ने उन्हें एक महीने का वक्त दिया है.
निर्दलीय सांसद नवनीत राणा और उनके पति रवि राणा की मुसीबतें खत्म होने का नाम नहीं ले रही हैं. हनुमान चालीसा विवाद में तो जमानत मिल गई, लेकिन अवैध निर्माण की वजह से दो बार उन्हें बीएमसी का नोटिस मिल चुका है. मामला सिविल कोर्ट में भी पहुंच चुका है जहां पर मंगलवार को राणा दंपति ने कहा है कि वे अपने फ्लैट के अवैध निर्माण को नियमित करवाएंगे.
सिविल कोर्ट ने राणा दंपति की इस एप्लीकेशन को स्वीकार कर लिया है और उन्हें एक महीने का समय दिया गया है. कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अगर नवनीत और रवि राणा ने एक महीने के भीतर अवैध निर्माण को नियमित करवा लिया तो ठीक, वरना बीएमसी कोई भी कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र रहने वाली है. वैसे इससे पहले बीएमसी की तरफ से राणा दंपति को सात दिन का अल्टीमेटम दिया गया था. उन्हें एक हफ्ते के भीतर अवैध निर्माण को हटाना था. लेकिन अब सिविल कोर्ट से एक महीने का वक्त मिल गया है.
बीएमसी नोटिस की बात करें तो उसमें स्पष्ट कहा गया है कि राणा दंपति के खार वाले फ्लैट में कम से कम 10 अवैध निर्माण पाए गए हैं. अब अगर समय रहते नवनीत और रवि राणा ने उस अवैध निर्माण को नियमित नहीं करवाया, तो उनके फ्लैट के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है. इसमें बुलडोजर एक्शन तक शामिल है.
वैसे इस विवाद से पहले मातोश्री के बाहर हनुमान चालीसा करने की ठानने वालीं नवनीत राणा कई दिनों के लिए जेल भी जा चुकी हैं. दरअसल नवनीत राणा ने सीएम उद्धव ठाकरे के निजी आवास मातोश्री के बाहर हनुमान चालीसा का पाठ करने का फैसला किया था. उसके बाद वे वहां पहुंच भी गई थीं. लेकिन क्योंकि शिवसैनिकों को पहले से उस कार्यक्रम का पता था, ऐसे में मौके पर शिवसैनिकों ने जमकर बवाल काटा. जमीन पर काफी तनाव देखने को मिला और खूब नारेबाजी हुई. बाद में पुलिस ने दंपति राणा पर राजद्रोह के तहत मामला दर्ज कर लिया और 23 अप्रैल को उनकी गिरफ्तारी हो गई.
बाद में कोर्ट से नवनीत राणा को जमानत भी मिली और पुलिस द्वारा उन पर लगाए गए राजद्रोह के आरोप को भी गलत बताया गया. कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा कि नवनीत के किसी भी बयान या एक्शन से हिंसा नहीं भड़कने वाली थी, सरकार गिराने वाली साजिश भी नजर नहीं आई, ऐसे में राजद्रोह के तहत कार्रवाई ठीक नहीं थी.

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