
'राम के बालक रूप की पूजा, पसंद का भोजन', क्या है रामानंदीय परिपाटी, जिससे होती आ रही है रामलला की पूजा
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अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन की तैयारियां आखिरी चरण में हैं. पुजारी बनने के लिए कैंडिडेट्स की ट्रेनिंग भी शुरू हो गई है. छह महीने के प्रशिक्षण के बाद उत्तीर्ण होने वाले अर्चक को ही मंदिर में पूजा का अधिकार मिलेगा. इसमें सबसे खास बात ये है कि भगवान राम की पूजा रामानंदीय संप्रदाय के अनुसार ही होगी.
अयोध्या में भगवान श्रीराम के मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की तैयारियों के बीच लगातार पुजारियों की भी चर्चा हो रही है. जिस मंदिर पर देश समेत पूरी दुनिया की नजरें हैं, उसमें पूजा-पाठ करने वाले भी पूरी तरह से ट्रेंड हों, इसकी कोशिश चल रही है. हजारों आवेदनों में से 21 अर्चकों को छांटा गया. इसमें भी छंटनी बाकी है. अंतिम चरण के बाद जो भी पुजारी नियुक्त होगा, वो रामानंदीय संप्रदाय का पालन करते हुए राम लला की पूजा करेगा. जब से राम लला यहां विराजमान हैं, तब से इसी परंपरा से ही उनका पूजन होता आया है.
प्रभु श्रीराम के बाल अवतार की पूजा
इसमें भगवान राम के बालक रूप की पूजा होती है. इस दौरान ध्यान रखा जाता है कि राम लला का श्रृंगार से लेकर उनकी देखभाल भी उतने ही अच्छे से हो, जैसे किसी बालक की होती है. इसमें उन्हें सुबह जगाना, स्नान करवाना और भोजन शामिल है. जो भी खाना श्री राम के बाल रूप को पसंद आए, उसी तरह का भोजन बनेगा. साथ ही हर दिन अलग रंग-रूप के कपड़े पहनाए जाएंगे.
सुबह जगाने के साथ दोपहर का आराम भी बाल रूप राम लला के लिए जरूरी है. तो पूजन के दौरान इसका भी पूरा ध्यान रखा जाएगा. मंत्रोच्चार पूरी तरह से शुद्ध हो, ये खास बात होगी. ये तमाम बातें रामानंदीय परंपरा का हिस्सा हैं.
कैसे हुई इस संप्रदाय की शुरुआत

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