
'बॉर्डर 2' नहीं करती भारत के जवानों संग न्याय, सनी देओल की पिक्चर ने किया निराश
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मेरे पिता ने भारतीय आर्मी में सर्विस की है. तो जाहिर है कि फिल्म 'बॉर्डर' के लिए मेरे मन में सॉफ्ट स्पॉट है. लेकिन दुख की बात ये है कि फिल्म 'बॉर्डर 2' ने मुझे निराश किया है.
1997 का वो साल मुझे आज भी याद है. मैं मुश्किल से 4 साल का था, कुछ भी याद करने के लिए बहुत छोटा. लेकिन एक याद जो मेरे साथ आज भी है, वो है मेरी नानी की. वो नानी जो बिहार के छोटे-से बगहा में रहती थीं. इस इमोशनल याद में मेरी नानी, बगहा के सिंगल स्क्रीन थिएटर में बैठी हैं.
ये उन दिनों की बात है जब एक पिक्चर देखना किसी त्योहार से कम नहीं होता था. फिल्म देखने का प्लान हम खाने के बीच या फिर मीटिंग्स के दौरान नहीं बनाते थे. फिल्मों की टिकटें कई दिनों पहले खरीद ली जाती थीं. गाड़ी का इंतजाम कर लिया जाता था. शेड्यूल क्लियर हो जाते थे. सिनेमा एक इवेंट की तरह था. मुझे इस सब में जो सबसे ज्यादा याद है, वो फिल्म देखने की तैयारी या स्क्रीन पर दिखने वाली भव्यता नहीं, बल्कि 'संदेसे आते हैं' गाने पर मेरी नानी का आंसू बहाना है.
जब थिएटर में सोनू निगम और रूप कुमार राठौड़ की आवाज गूंजी तो उनके इमोशन्स भी बांध तोड़कर उनकी आंखों से छलक ही आए थे. उनके मन में घर से दूर उस दामाद का ख्याल था, जो देश के उन कोनों में पोस्टेड था, जहां 90 के दशक के बिहार से पहुंच पाना बेहद मुश्किल रहा होगा. उस एक पल ने फिल्म 'बॉर्डर' को उसकी आत्मा दी थी. ये सिर्फ एक वॉर फिल्म नहीं थी. ये एक पुल था, भारत के जवानों और उन परिवारों के बीच, जो उनका इंतजार करते थे, उनके लिए दिन-रात परेशान होते थे और चुपचाप सबकुछ सहते थे.
सालों से 'बॉर्डर' मेरे साथ ही बड़ी हुई है. ये मेरे रचनात्मक सालों का हिस्सा बन गई, और फिर बाद में मेरे खुद आर्मी की वर्दी पहनने के सपने की तैयारी में बदल गई. इस पिक्चर ने एक पूरी पीढ़ी को सिखाया कि देशभक्ति शोर-गुल वाली, चमक-धमक वाली या अपने सुविधा के अनुसार नहीं होती है, ये अकेली होती है, थका देने वाली और गहराई तक इंसानियत से भरी. 28 साल बाद, सनी देओल फिल्म 'बॉर्डर 2' के साथ लौट आए हैं. इससे बड़ी उम्मीदें लगाई गई थीं. इसलिए नहीं क्योंकि दर्शक बड़े धमाके देखना चाहते थे, लेकिन इसलिए क्योंकि वो वही ईमानदारी चाहते थे, जो उन्होंने सालों पहले पर्दे पर देखी थी. दुर्भाग्य से ये फिल्म वो करने में फेल हो गई.
कहानी सुनाने के नजरिए से देखा जाए तो कुछ चीजों के लिए माफी दी जा सकती है. सिनेमा में हमेशा सच्चाई और कल्पना को मिलाकर ही परोसा जाता है. लेकिन जब एक फिल्म भारत के जवानों का सम्मान करने का दावा करती है, तो लापरवाही का मार्जिन बहुत कम हो जाता है. इसे बहुत बारीकी से सोचना पड़ता है ताकि चीजें ऑथेंटिक रहे और आप इससे जुड़ भी पाएं. 'बॉर्डर 2' ये करने में नाकाम रहती है. पिक्चर को लेकर रिसर्च में कमी रह गई है, ये आप साफ देख सकते हैं. खासकर जैसे ऑपरेशंस और इंटर-सर्विस डायनेमिक को दर्शाया गया है.
एरियल सीक्वेंस पर ध्यान दिया जाए तो पिछले कुछ सालों में मेनस्ट्रीम सिनेमा में दिखा सबसे खराब सीजीआई इसी पिक्चर में है. ये सीन में चल रही टेंशन को बढ़ाकर दिखाने की बजाए आपका ध्यान भंग करता है. नेवी को जिस तरह दिखाया गया है, वो जल्दबाजी भरा और आर्टिफिशियल लगता है. ये बस कुछ विजुअल शॉर्टकट्स में सिमट गई है, जबकि इसे एक जटिल, प्रोफेशनल फोर्स के रूप में दिखाना चाहिए था. ऐसे वक्त में जब एआई बहुत आसानी से उपलब्ध है और किसी भी चीज को परफेक्ट तरीके से तैयार किया जा सकता है, 'बॉर्डर 2' में नौसेना के शिप और पनडुब्बी को खराब सीजीआई में देखना काफी दुखद था.













