
बांग्लादेश से आए लोगों को मिलेगी 'पहचान'? नागरिकता कानून की धारा 6A पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को समझिए
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सुप्रीम कोर्ट ने नागरिकता कानून की धारा 6A की संवैधानिकता को बरकरार रखा है. सुप्रीम कोर्ट ने 4:1 के बहुमत से इसे सही ठहराया है. इसका मतलब ये हुआ कि जनवरी 1966 से पहले बांग्लादेश से असम में आए लोग भारतीय नागरिक बने रहेंगे. वहीं, 1966 से 1971 की बीच आए बांग्लादेशी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे.
नागरिकता कानून की धारा 6A की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है. सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने 4:1 से धारा 6A की संवैधानिकता को बरकरार रखा है.
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस एमएम सुरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे. बेंच के एकमात्र जज जस्टिस जेबी पारदीवाला ने ही धारा 6A को असंवैधानिक माना है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असम अकॉर्ड अवैध प्रवासियों की समस्या का राजनीतिक समाधान था, जबकि धारा 6A एक विधायी समाधान था. कोर्ट ने ये भी कहा कि असम की स्थानीय आबादी को ध्यान में रखते हुए ये प्रावधान करना सही था.
बहुमत से फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करने वाले राज्यों में से असम को अलग तरह से देखना सही था, क्योंकि यहां की स्थानीय आबादी में अप्रवासियों का प्रतिशत ज्यादा है. पश्चिम बंगाल में 57 लाख अप्रवासी हैं, जबकि असम में 40 लाख अप्रवासी बसे हैं. फिर भी असम की कम आबादी को देखते हुए ऐसा करना सही था, क्योंकि बंगाल की तुलना में असम का जमीनी इलाका काफी कम है. कोर्ट ने माना कि 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ डेट लगाना सही था.
क्या है नागरिकता कानून की धारा 6A?
1979 में असम से अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने की मांग को लेकर ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने आंदोलन शुरू किया. लगभग छह साल तक चले आंदोलन के बाद 1985 में एक समझौता हुआ, जिसे 'असम अकॉर्ड' कहा जाता है.

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