
बांग्लादेश में बोगस चुनाव की तैयारी, 12 फरवरी को कुछ भी ‘फ्री एंड फेयर‘ नहीं होगा
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जिस तरह यूनुस की अंतरिम सरकार ने बांग्लादेश में जमात-ए-इस्लामी को छुट्टा छोड़ दिया है. और चुनाव आयोग में जमात-फ्रेंडली इंतेजाम हो रहे हैं. 12 फरवरी को होने वाले बांग्लादेश के चुनाव में BNP के लिए उम्मीदें कम ही हैं.
बांग्लादेश में निष्पक्ष चुनाव का जो वादा किया जा रहा था, वह अब खोखला होता दिख रहा है. कहा जा रहा था कि यह पंद्रह साल में पहला निष्पक्ष चुनाव होगा. लेकिन हालात कुछ और ही इशारा कर रहे हैं. जिस अंतरिम सरकार के हाथ में चुनाव कराने की जिम्मेदारी है, उसका खुद कोई संवैधानिक आधार नहीं है.
अगस्त 2024 में शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज-जमान ने इस सरकार को बनाया. इसके लिए उन्होंने 'जरूरत के सिद्धांत' का सहारा लिया. यही सिद्धांत पाकिस्तान में सैन्य तख्तापलट को जायज ठहराने के लिए इस्तेमाल होता रहा है. हालांकि जमान खुद सैनिक शासन के पक्ष में नहीं थे. उन्होंने मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार पर जल्दी चुनाव कराने का दबाव बनाया.
एक साल से ज्यादा समय तक टालमटोल के बाद यूनुस ने आखिरकार चुनाव आयोग से 12 फरवरी को चुनाव कराने की घोषणा करवाई. लेकिन इसके साथ ही उन्होंने भ्रम भी बढ़ा दिया. उन्होंने उसी दिन एक संवैधानिक जनमत संग्रह कराने की बात भी जोड़ दी. कानूनी जानकारों का कहना है कि मौजूदा बांग्लादेशी संविधान में जनमत संग्रह का कोई प्रावधान नहीं है. ठीक वैसे ही जैसे अंतरिम सरकार का भी कोई जिक्र नहीं है. कानूनी विशेषज्ञ बैरिस्टर तानिया आमिर का कहना है कि 'चुनाव कराने वाली सत्ता और चुनाव के साथ जनमत संग्रह कराना, दोनों ही संविधान के खिलाफ है.'
चुनाव सबको साथ लेकर नहीं हो रहे
ये चुनाव समावेशी भी नहीं हैं. भारत हमेशा यही बात कहता रहा है. देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी आवामी लीग को चुनाव लड़ने से रोक दिया गया है. यूनुस ने पहले इसे अस्थायी बताया था. लेकिन चुनाव से पहले इस रोक को हटाया नहीं गया.
आवामी लीग वही पार्टी है जिसने 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ आजादी की लड़ाई का नेतृत्व किया था. आजादी के बाद से करीब आधे समय वही सत्ता में रही. तानिया आमिर पूछती हैं कि क्या भारत में कांग्रेस के बिना या अमेरिका में डेमोक्रेट्स के बिना निष्पक्ष चुनाव हो सकता है.

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